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'पर्वतारोहण के सिवा दूसरा काम नहीं सीखा, मेरा लक्ष्य है कि मैं कम से कम 25 बार एवरेस्ट फतह करूं'

Sat, 19 May 2018 07:00 PM IST
कामी रीता शेरपा
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Kami Rita Sherpa
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मैं नया इतिहास लिखना चाहता हूं। मेरा लक्ष्य है कि मैं कम से कम पच्चीस बार एवरेस्ट फतह करूं। मैं यह रिकॉर्ड न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने परिवार और नेपाल के लोगों के लिए बनाना चाहता हूं।

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मैं नेपाल के सोलुखुंबु जिले के थामे गांव से ताल्लुक रखता हूं। यह वही इलाका है, जहां दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी सागरमाथा यानी माउंट एवरेस्ट स्थित है। बीसवीं सदी के मध्य में नेपाल ने विदेशी पर्वतारोहियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। मेरे पिता उन शुरुआती पेशेवर गाइड में से एक थे, जो विदेशी पर्वतारोहियों की मदद करते थे। मेरे भाई ने भी एवरेस्ट की ऊंचाई सत्तरह दफे नापी है। इस तरह से शेरपा परंपरा का हिस्सा होना मेरी पारिवारिक विरासत है।

चौबीस की उम्र में पहली चढ़ाई
ठंडे पहाड़ों में काम के सीमित विकल्प को वजह मानें या खानदानी काम के प्रति दिलचस्पी, मैंने बचपन में ही तय कर लिया था कि मुझे गाइड बनना है। बचपन में मैं यह देखता था कि जो लोग पर्वतारोहण अभियान से लौटकर गांव में आते थे, उनके पास अच्छे कपड़े और दूसरी महंगी चीजें होती थीं। शेरपा बनने के लिए यह मेरे लिए एक सात्विक किस्म का लालच था। चौबीस की उम्र में मैंने पहली बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की। उसके बाद तो यह काम लगभग हर साल मेरे अभ्यास में आ गया। साथ ही मैंने अपने इलाके की दूसरी महत्वपूर्ण चोटियां फतह करना जारी रखा।

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बहुत मुश्किल है पर्वतारोहण

Kami Rita Sherpa
चार साल पहले मैं बेस कैंप में था, जब एक हिमस्खलन ने सोलह शेरपाओं की जान ले ली थी। उनमें से पांच तो मेरी ही टीम से थे। अगले ही साल भूकंप की वजह से मेरे बेस कैंप में दर्जनों लोग मारे गए। निश्चित रूप से पर्वतारोहण एक बेहद जोखिम भरा काम है। इसमें खतरों का कोई पूर्वानुमान नहीं होता। लेकिन मैं यह काम बड़ी सहजता से करता हूं। इस सहजता का कारण यह है कि मुझे कोई दूसरा काम नहीं आता या मैंने कभी दूसरा कोई काम सीखना ही नहीं चाहा।

अपने काम से बच्चों को दूर रखा है
मेरे शेरपा बनने के पीछे की वजहें कितनी भी तर्कपूर्ण हों, लेकिन मेरे परिवार पर मेरे काम का गहरा असर पड़ा है। मैं जब भी पर्वतारोहण अभियान के लिए घर से निकलता हूं, मेरी बीवी आतंकित हो जाती है। वह हर वक्त मुझसे कोई दूसरा काम करने को कहती है, पर मैं हर बार उसे मना कर देता हूं। हां, यह मेरी पत्नी की भावनात्मक जीत है कि मैं अपने बच्चों को शेरपा नहीं बनाने का फैसला किया है। फिलहाल मेरे दोनों बच्चे काठमांडू के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं।

अब अगला लक्ष्य
एक शेरपा के रूप में मैं एवरेस्ट की प्रत्येक चढ़ाई से करीब दस लाख नेपाली रुपये कमा लेता हूं। यह रकम मेरे लिए बहुत मायने रखती है, क्योंकि मेरे देश के अधिकतर नागरिक साल भर में एक लाख रुपये भी नहीं कमा पाते। मेरे अलावा दो अन्य शेरपा भी इक्कीस बार एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। सब के सब एवरेस्ट की छाया में पले-बढ़े हैं। मुझे छोड़कर दोनों लोग अपने काम से रिटायर हो चुके हैं। मगर अड़तालीस की उम्र पार करने के बावजूद मेरा शरीर मेरे साथ है, मैं अब भी अपना काम कर रहा हूं।

-रिकॉर्ड बाईस बार एवरेस्ट फतह करने वाले शेरपा के साक्षात्कारों पर आधारित।
 
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