वर्ष 2011 में मुझे पेट की एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया। डॉक्टरों ने बताया कि मेरे पाचन तंत्र में इंफेक्शन है। इसके चलते मैं तकरीबन छह माह तक बिस्तर पर पड़ी रही। इस दौरान कई बार मुझे लगा कि अब मेरा करियर खत्म हो जाएगा, शायद ही मैं मैदान पर खेल सकूं। पर धीरे-धीरे बुरा वक्त बीत गया, मैं दोबारा मैदान में थी। इस बार मेहनत ज्यादा करनी पड़ी। करीब छह माह के कड़े प्रशिक्षण के बाद बाद मेरा चयन वर्ष 2012 की एशियन कबड्डी चैंपियनशिप में भारतीय टीम के लिए हो गया।
मैं ऑलराउंडर थी, लेकिन मेरे कोच ने मुझसे कहा कि गेम के किसी खास क्षेत्र में महारत हासिल करो, तो इसके बाद मैं फुल-टाइम डिफेंडर बन गई। हमारी टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। वर्ष 2014 के एशियन खेल में हमने दोबारा स्वर्ण पदक जीता। स्वर्ण पदक जीतने के बाद मेरी जिंदगी बदल गई थी। सरकार से मुझे इनाम के तौर पर आर्थिक मदद मिली, जिसके बाद मैं ढाबा छोड़कर अपने परिवार के साथ मनाली के पास एक फ्लैट लेकर रहने लगी।
मेरा छोटा भाई अब अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रहा है। वह मेरे और परिवार के लिए गर्व व भावुकता का पल था, जब मैंने अपने माता-पिता के लिए छत का इंतजाम किया। मेरी बहन और माता-पिता ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया। वे चाहते थे कि मैं अपने सपने को पूरा करूं। मैं उनके समर्थन के बिना भारतीय टीम के लिए कभी नहीं खेल पाती।
विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।