घरवाले तो किसी तरह मान गए, पर असल समस्या बाहर वालों के साथ शुरू हुई। एकेडमी की ड्रेस पहनकर जब मैं फुटबॉल खेलने जाती थी, तो आस-पास के लोग मेरे कपड़ों को लेकर छींटाकशी करते थे। वे कहते थे कि फुटबॉल लड़कियों के लिए नहीं है, अगर कुछ करना ही है तो पढ़ाई करो।
लेकिन मम्मी-पापा के प्रोत्साहन की वजह से मैंने उन पर ध्यान नहीं दिया। चूंकि यहां पत्थरबाजी की घटनाएं ज्यादा होती थीं, तो अक्सर कर्फ्यू लगा दिया जाता था, ऐसे में मुझे घर पर ही फुटबॉल की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी। एकेडमी में प्रैक्टिस करने के दौरान ही मुझे वर्ष 2010 और 2011 में जम्मू कश्मीर की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेलने का मौका मिला। कश्मीर के जो हालात हैं, उनमें मैं नहीं चाहती थी कि जिन दिक्कतों का सामना मैंने किया, उन्हीं का सामना कोई दूसरी लड़की करे। दूसरा, इन लड़कियों के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि उनकी बेटियां खुली जगह पर फुटबॉल खेले।
जल्द ही मैंने जम्मू और कश्मीर फुटबॉल एसोसिएशन (जेकेएएफए) से कोच बनने के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया। यहीं से मैंने डी-लाइसेंस प्राप्त किया, जो फीफा से मान्यता प्राप्त है। इसके बाद मैंने श्रीनगर में ही अंडर-16 और अंडर-19 बैच को कोचिंग देनी शुरू की। यहां लड़कों के अलावा लड़कियों को भी ट्रेनिंग दी जाती है।
अक्सर लोग कहते हैं कि मैं दूसरी लड़कियों को बिगाड़ रहीं हूं। इसके बावजूद मुझे या कोचिंग लेने वाली लड़कियों को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मेरा मानना है कि हम क्या खेलते हैं यह मेरा अपना हक है। मेरा मानना है कि यदि आप दिल से कोई काम करना चाहते हैं, तो उसे करने का प्रोत्साहन अपने आप मिलने लगता है। जहां तक बात कश्मीर की है, तो यहां कई सारी समस्याओं के बावजूद विभिन्न खेलों की ओर आकर्षित हो रही प्रतिभाएं मौजूद हैं।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)