मेरा जन्म वनग्राम में हुआ था, कहा जा सकता है ‘पथेर पांचाली’ के देश में। विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय यहीं रहते थे। बचपन में ही हेडमास्टर महाशय ने यह मान ही लिया था कि मैं लेखक बनूंगा, लेकिन वैसा कोई लक्ष्य मेरा था ही नहीं। एक नाटककार होने में बाबा ने जीवन का एक बहुमूल्य समय नष्ट कर दिया था। उन्हें भय था कि कहीं वह बुरा नशा मुझे न लग जाए। दर्जा आठ में पढ़ते समय स्कूल मैगजीन में सबसे पहले लिखा। लेखक बनने का सपना तो बहुत बाद की बात है।
दुख, दारिद्र्य, अवहेलना, अपमान के कारण, मुझे एक लेखक की भूमिका में अवतीर्ण होने का दुस्साहस करना पड़ा। रचना प्रकाशित होने की कोई संभावना नहीं थी। जीवन के एक स्मरणीय अध्याय की कहानी पूरी तरह भूल जाने के पहले लिख डालने की व्याकुलता ही सबसे बड़ा लक्ष्य था। कोई अज्ञात शक्ति आत्मप्रकाश का कोई अन्य पथ न पाकर मुझे इस लाइन में खींच लाई थी। एक दिन नींद से उठकर देखा कि मैं एक लेखक हूं।
साहित्य के लक्ष्य स्थान तक पहुंचने के लिए मेरे हाथ में कोई मानचित्र नहीं था, इसलिए जब जो दिमाग में आया, उसी को प्रश्रय दे डाला। परिणाम यह हुआ कभी उपन्यास, कभी कहानी, कभी रम्य-रचना, कभी भ्रमण-कहानी, कभी रस-रचना अथवा कभी महामानवों की जीवन-गाथा लिखता रहा हूं।
सोच-समझ कर,एक योजना बनाकर सृष्टि का पौध तैयार करना बहुत अच्छा है, लेकिन मेरे जैसे लोग जो अव्यवस्थित प्रकृति के होते हैं, वे सुयोग्य होते हुए भी पाठकों और प्रियजनों की प्रत्याशा पूरी नहीं कर पाते हैं। हेडमास्टर मशाई ने मुझे नाना विषयों में एक साथ अत्युत्साही होने की आदत लगा दी। वह कहा करते थे, लेखक के मन के रस में डूबकर पत्थर भी खजूर की तरह नरम हो जाता है।