उनके घर स्कूल से दूर थे। स्कूल दूरदराज के गांवों में थे। सीजन कोई भी हो 3 से 7 किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें स्कूल जाना पड़ता था। उन बच्चों के हालात को कोई देख रहा था। उन नन्हें पैरों की किलोमीटर लंबी पदचाप वो सुन रहा था। वो बेचैन हो उठा, उसने ठान लिया कि चाहें कुछ भी हो जाए मुफलिसी और किस्मत के मारे बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर करेगा।
एक दिन पॉश इलाके की हाउसिंग सोसायटी में खराब पड़ी साइकिलों को देखकर उसके मन में विचार कौंधा। और एक विचार, एक प्रयास, एक मुहिम ने देखते ही देखते सैकड़ों बच्चों की जिंदगी में खुशियां और सहूलियत भर दी।
कहानी महाराष्ट्र की है। एक स्वतंत्र पत्रकार के नेक इरादों और उसकी जी तोड़ मेहनत से मिली सफलता की है। आगे की स्लाइड में पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी।