मैंने लिफ्ट के पास कोच को देखा और तुरंत उनके पास पहुंच कर पैरा खेलों के अलावा अपनी खेल यात्रा के बारे में उन्हें बताया। उस समय 2018 के जकार्ता पैरा एशियाई खेलों में कुछ महीने का समय बाकी था और मैंने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया, जिसके बाद वह हैदराबाद स्थित अकादमी में मुझे मौका देने के लिए तैयार हो गए।
इसके बाद मैं हैदराबाद आ गई। यहां अकादमी में कोच जे राजेंद्र कुमार और फिटनेस ट्रेनर एल राजू की देख-रेख में मेरा प्रशिक्षण शुरू हुआ। प्रशिक्षण सत्र मेरे लिए मुश्किल भरा रहा, क्योंकि मैं दौड़ने या साइकिल चलाने में सक्षम नहीं थी। दिन में तीन बार प्रैक्टिस सेशन होते थे, जिन्हें मैं कभी नहीं छोड़ती थी। फिटनेस पर फोकस करने की वजह से मेरी मांसपेशियां मजबूत हुईं। उस प्रशिक्षण ने मुझे और मजबूत बनाया।
हैदराबाद में ही मेरे कट चुके पैर का प्रोस्थेटिक (कृत्रिम) प्रत्यारोपण किया गया। मैंने यहां अलग-अलग कौशल सीखे। इन सभी चीजों की वजह से ही मैं विश्व खिताब जीत सकी। गोपी सर हमेशा मेरे मैच के दौरान मौजूद रहते थे और मेरा हौसला बढ़ाते थे।
मैं हमेशा चाहती हूं कि सभी दिव्यांगजन पैरा खेलों में रुचि लें। कम से कम एक खेल में वे खुद को आजमाएं। ऐसा करके वे बाकियों से कुछ अलग काम कर पाएंगे। यह वास्तव में आसान है। एक बार जब आप तय कर लेते हैं कि कुछ करना चाहते हैं, तो लोग आपकी मदद के लिए आगे आएंगे। आपको बस एक समय में एक कदम उठाना है। जो आप कर रहे हैं उस पर ध्यान केंद्रित करें। जब आपका ध्यान केंद्रित हो जाए, तो सब कुछ बहुत सरल हो जाएगा।
-पैरालंपिक खिलाड़ी के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।