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मंजिलें और भी हैं: दिव्यांग कम से कम एक खेल में खुद को आजमाएं

Fri, 13 Sep 2019 04:18 AM IST
Nilesh Kumar मानसी जोशी
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मानसी जोशी - फोटो : अमर उजाला
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पैरा बैडमिंटन विश्व चैंपियनशिप के लिए मैंने बहुत मेहनत की थी। मैं खुश हूं कि मेरी मेहनत रंग लाई। यह वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेरा पहला स्वर्ण पदक है, जो मेरे प्रशिक्षकों और गोपीचंद अकादमी के बिना संभव नहीं था। मैं महाराष्ट्र की रहने वाली हूं। मेरे पिता भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक हैं। 

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बचपन से ही मैं उनके साथ बैडमिंटन खेलती थी। पापा शटल फेंकते थे और मैं उसे हिट करती थी। मैंने इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई की है। पढ़ाई के दौरान जिला स्तर पर मैंने बैडमिंटन खेला है। मैं बैडमिंटन को लेकर बहुत उत्साहित रहती थी। लेकिन कुछ वर्ष पहले हुए सड़क हादसे ने एक पल में सब कुछ बदल दिया। 

हादसे के बाद मुझे अस्पताल पहुंचाने में तकरीबन तीन घंटे लग गए। मेरा हाथ भी फ्रैक्चर था। अस्पताल में कई घंटों की सर्जरी के बाद, पैर काटकर मुझे बचाया गया। लगभग दो महीने अस्पताल में रहने के बाद मैं घर लौटी। उस समय मैं केवल यही सोच रही थी कि मैंने एक पैर ही गंवाया है, अगर दौड़ने लायक नहीं रही, तो भी कोई बात नहीं। इसके बावजूद मैंने खेल से अपना नाता कायम रखने पर विचार किया। 
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पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद मैं अहमदाबाद चली गई और वहां के एक बैंक में काम करने लगी। मैं बैडमिंटन का व्यावसायिक प्रशिक्षण लेने के बारे में सोचने लगी थी। एक बार बैंक के पास ही एक कार्यक्रम हो रहा था, जिसमें मशहूर कोच पुलेला गोपीचंद वक्ता के रूप में आए हुए थे। मैं उनसे प्रशिक्षण के लिए बात करना चाहती थी, पर थोड़ा झिझक रही थी। लेकिन मेरे सहयोगियों ने जोर दिया कि गोपीचंद से मिलने की कोशिश करनी चाहिए। 

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मैंने लिफ्ट के पास कोच को  देखा और तुरंत उनके पास पहुंच कर पैरा खेलों के अलावा अपनी खेल यात्रा के बारे में उन्हें बताया। उस समय 2018 के जकार्ता पैरा एशियाई खेलों में कुछ महीने का समय बाकी था और मैंने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया, जिसके बाद वह हैदराबाद स्थित अकादमी में मुझे मौका देने के लिए तैयार हो गए। 

इसके बाद मैं हैदराबाद आ गई। यहां अकादमी में कोच जे राजेंद्र कुमार और फिटनेस ट्रेनर एल राजू की देख-रेख में मेरा प्रशिक्षण शुरू हुआ। प्रशिक्षण सत्र मेरे लिए मुश्किल भरा रहा, क्योंकि मैं दौड़ने या साइकिल चलाने में सक्षम नहीं थी। दिन में तीन बार प्रैक्टिस सेशन होते थे, जिन्हें मैं कभी नहीं छोड़ती थी। फिटनेस पर फोकस करने की वजह से मेरी मांसपेशियां मजबूत हुईं। उस प्रशिक्षण ने मुझे और मजबूत बनाया। 

हैदराबाद में ही मेरे कट चुके पैर का प्रोस्थेटिक (कृत्रिम) प्रत्यारोपण किया गया। मैंने यहां अलग-अलग कौशल सीखे। इन सभी चीजों की वजह से ही मैं विश्व खिताब जीत सकी। गोपी सर हमेशा मेरे मैच के दौरान मौजूद रहते थे और मेरा हौसला बढ़ाते थे।

मैं हमेशा चाहती हूं कि सभी दिव्यांगजन पैरा खेलों में रुचि लें। कम से कम एक खेल में वे खुद को आजमाएं। ऐसा करके वे बाकियों से कुछ अलग काम कर पाएंगे। यह वास्तव में आसान है। एक बार जब आप तय कर लेते हैं कि कुछ करना चाहते हैं, तो लोग आपकी मदद के लिए आगे आएंगे। आपको बस एक समय में एक कदम उठाना है। जो आप कर रहे हैं उस पर ध्यान केंद्रित करें। जब आपका ध्यान केंद्रित हो जाए, तो सब कुछ बहुत सरल हो जाएगा।
 
-पैरालंपिक खिलाड़ी के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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