मुझे शुरू से ही ट्रेकिंग का शौक रहा है। मैंने वर्ष 1998 में कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए आवेदन किया था। मुझे यात्रा का संभावित वक्त कुछ महीने बाद बताया गया। लेकिन आवेदन के दस दिनों के भीतर मुझे यात्रा दस्ते में चयनित होने की सूचना दी गई। मेरे लिए वह धर्म संकट का समय था, क्योंकि मैं उस वक्त दो बेहद खास मरीजों का इलाज कर रहा था और उनको छोड़कर जाना बहुत मुश्किल था। मैंने यात्रा निरस्त कर दी। चंद दिनों में ही खबर आई कि जिस दस्ते में मुझे जाना था, वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया है और सभी यात्री मारे गए हैं। उस दिन मुझे लगा, मानो ईश्वर ने मुझे किसी खास मकसद से नई जिंदगी दी है।
पिता समान बाबा आम्टे
2004 में बाबा आम्टे से मुलाकात के बाद मैंने मनोरोगियों के लिए पुनर्वास केंद्र खोलने का फैसला किया, जिसके लिए मेरी पत्नी ने मेरा पूरा साथ दिया। दरअसल बाबा आम्टे को रोगियों की सेवा करते देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। रोगियों से उनका भावनात्मक जुड़ाव चरम पर था। सेवा का ऐसा उदाहरण मैंने पहले कभी नहीं देखा था। कुष्ठ और मानसिक रोगियों के लिए ताउम्र काम करने वाले बाबा आम्टे मेरे प्रेरणास्रोत हैं।
अपने जैसों की मदद करना चाहता हूं
मनोरोगियों को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए कई दफे मुझे अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी। हजारों मनोरोगियों को ठीक करके उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने के साथ मैंने कई बच्चों को उनके परिवारों से मिलाया है। जिंदगी के इस पड़ाव में अब कुछ नया करने का विचार तो नहीं है, पर यह जरूर है कि मैं किसी भी व्यक्ति, जो इस दिशा में काम करना चाहता है, की मदद करना चाहता हूं।
-रेमन मैगसायसाय अवॉर्ड के लिए नामित भरत वतवानी से नूतन कुमार गुप्ता की बातचीत पर आधारित।