फर्स्ट ईयर में ही प्रोफेसरों ने मुझे यूपीएससी परीक्षा के बारे में बताया। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ मैंने यूपीएससी की कोचिंग के बारे में भी सोचा। पर उसकी फीस दे पाना मेरे लिए आसान नहीं था। कोचिंग कराने वाली यूनीक एकेडमी की फीस सात हजार रुपये थी। मैंने एकेडमी के टुकाराम जाधव सर से मुलाकात की और अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताया। मुझसे बातचीत करने के बाद उन्होंने फीस में पचास फीसदी कटौती कर दी।
वहां कोचिंग करने वाले युवा बीस से तीस साल के थे, और कई तो एक से अधिक बार यूपीएससी दे भी चुके थे। मैं उनमें सबसे छोटा था और सबसे पीछे बैठता था। जब मैं सर से ऊटपटांग सवाल पूछता, तो वे मेरा मजाक उड़ाते। तब पैसे के अभाव में मुझे वड़ा-पाव पर पूरा दिन गुजारना होता और दोस्तों से स्टडी मैटेरियल लेकर उनकी फोटोकॉपी करानी पड़ती। इस तरह यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा मैंने निकाल ली, पर मेन्स से पहले मेरे बहनोई की मौत हो गई।
इसके बावजूद मैंने मेन्स क्लियर किया। इंटरव्यू में मुझसे मुस्लिम युवाओं के कट्टरवादी संगठनों से जुड़ने पर सवाल किया गया। एक ने मुझसे पूछा कि मैं शिया हूं या सुन्नी। मैंने कहा, सबसे पहले मैं भारतीय हूं। इस तरह 21 साल की उम्र में अपनी पहली ही कोशिश में मैं आईएएस हो गया। मेरा मानना है कि गरीबी और प्रतिकूल स्थिति आपके दृढ़ इरादे को नहीं बदल सकती। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यूपीएससी में लाखों छात्रों से मुकाबला है। बल्कि मुकाबला सिर्फ अपने आप से है। आज मैं अपने इलाके के युवाओं की प्रेरणा बन गया हूं और मैं उनका जीवन बदलने की कोशिश भी कर रहा हूं।