मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने मंगलवार को 18 वर्षीय अतुल कुमार के वकील से कहा, "हम यथासंभव आपकी मदद करेंगे। लेकिन पिछले तीन महीनों से आप क्या कर रहे थे, क्योंकि फीस जमा करने की समय सीमा 24 जून को समाप्त हो गई थी।"
कुमार के माता-पिता सीट ब्लॉक करने के लिए आवश्यक फीस जमा करने की समय सीमा 24 जून तक स्वीकृति शुल्क के रूप में 17,500 रुपये जमा करने में विफल रहे। युवक के माता-पिता ने कड़ी मेहनत से अर्जित सीट को बचाने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, झारखंड विधिक सेवा प्राधिकरण और मद्रास उच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया।
उनके वकील ने पीठ को बताया कि कुमार ने अपने दूसरे और आखिरी प्रयास में जेईई एडवांस की परीक्षा पास की है और अगर शीर्ष अदालत उनकी मदद नहीं करती है तो वह परीक्षा में दोबारा शामिल नहीं हो पाएंगे।
बहुत ही संक्षिप्त बहस के बाद पीठ ने आईआईटी मद्रास के संयुक्त सीट आवंटन प्राधिकरण, आईआईटी एडमिशन को नोटिस जारी किया, जिसने इस साल परीक्षा आयोजित की थी।
युवक के परिवार की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए वकील ने कहा कि छात्रों के लिए 24 जून की शाम 5 बजे तक 17,500 रुपये का इंतजाम करना बहुत मुश्किल काम था, वह भी आईआईटी धनबाद में सीट आवंटित होने के महज चार दिन बाद।
कुमार एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा है और उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के टिटोरा गांव में रहने वाले गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वाले परिवार से है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी उसकी मदद करने में असमर्थता जताई है।
चूंकि उसने झारखंड के एक केंद्र से जेईई की परीक्षा दी थी, इसलिए युवक ने झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का भी रुख किया, जिसने उसे मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का सुझाव दिया, क्योंकि यह आईआईटी मद्रास ही था जिसने परीक्षा आयोजित की थी। उच्च न्यायालय ने उसे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा।