सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद क्या बदला?
- नए संस्करण में वह वाक्य हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा पर कांग्रेस नेता असहाय थे।
- पहले की किताब में लिखा था कि अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम मतभेदों का फायदा उठाकर भारत का विभाजन किया और कांग्रेस ने अंततः इसे स्वीकार किया।
- संशोधित पाठ्यपुस्तक में जोड़ा गया है कि वी.डी. सावरकर ने भी 1925 में स्वराज की मांग उठाई थी।
- पुराने संस्करण में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सेना खड़ी करने के लिए हिटलर से समर्थन मांगने का उल्लेख था।
- हिटलर को "नस्लवादी नाजी विचारधारा वाला तानाशाह" बताने वाला हिस्सा भी हटाया गया है।
- नई किताब में केवल यह कहा गया है कि बोस ने "ब्रिटिश विरोधी ताकतों" से समर्थन मांगा था।
- संशोधित संस्करण से हिटलर और नाजी विचारधारा के सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं।
- फरवरी में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था।
- अदालत ने पुस्तक की भौतिक और डिजिटल प्रतियां वापस लेने तथा आगे के प्रकाशन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।
- नई पाठ्यपुस्तक की भूमिका में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और समीक्षा प्रक्रिया के बाद प्रकाशित किया गया है।
इसमें यह भी बताया गया है कि 16 मार्च के आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की एक समिति ने चौथे अध्याय, "समाज में न्यायपालिका की भूमिका" (The Role of the Judiciary in Society), को "फिर से लिखा" था।
वापस ली गई पाठ्यपुस्तक की विकास टीम में 51 सदस्य शामिल थे। संशोधित संस्करण में 48 सदस्य हैं, जिनमें से तीन लोगों - मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार - के नाम हटा दिए गए हैं, जिन्हें शुरू में इस अध्याय के लिए जिम्मेदार माना गया था।