अदालत ने पाया कि अधिकांश राज्यों के पास विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के आंकड़े तो मौजूद हैं, लेकिन वे इन बच्चों के लिए आवश्यक शिक्षकों के पदों की पहचान करने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए स्वीकृत शिक्षकों के पदों को अधिसूचित करना होगा।
7 मार्च को जारी आदेश में कहा गया है कि अधिसूचना जारी करने के बाद, 28 मार्च, 2025 तक या उससे पहले, इन स्वीकृत पदों के बारे में कम से कम दो बड़े समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा। इसके अलावा, संबंधित राज्य सरकार की वेबसाइट और शिक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी।
यह मामला रजनीश कुमार पांडे द्वारा अधिवक्ता प्रशांत शुक्ला के माध्यम से दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में विशेष शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाया गया था। याचिका 17 शिक्षकों द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी कि शिक्षा के अधिकार को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए, इन बच्चों को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करने हेतु प्रत्येक स्कूल में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर गंभीर रुख अपनाते हुए कहा कि केवल योग्य और सक्षम शिक्षकों को ही नियुक्त किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तदर्थ संविदा शिक्षक ही विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को पढ़ा रहे हैं और उनकी कक्षाओं का संचालन कर रहे हैं। कोर्ट को यह भी जानकारी दी गई कि कुछ राज्यों में ये शिक्षक पिछले 20 वर्षों से इसी तरह कार्यरत हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे तत्काल एक स्क्रीनिंग समिति का गठन करें। इस समिति में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए राज्य आयुक्त, शिक्षा विभाग के सचिव और भारतीय पुनर्वास परिषद के एक नामित विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी राज्य में दिव्यांगता आयुक्त उपलब्ध नहीं है, तो उनकी जगह कानूनी प्रतिनिधि या विधि सचिव को नियुक्त किया जा सकता है।