जस्टिस ए एस चंदुरकर और राजेश पाटिल की खंडपीठ ने 10 जुलाई को अपने आदेश में यह भी कहा कि केवल सहानुभूति के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कोई भी राहत अन्य छात्रों के साथ अन्याय होगी।
कोर्ट, सिद्धांत राणे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु को चार वर्षीय बैचलर ऑफ साइंस (रिसर्च) कार्यक्रम के लिए उनके आवेदन पत्र को स्वीकार करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
राणे को प्रवेश प्रक्रिया के लिए अयोग्य ठहराया गया था क्योंकि उन्होंने समय सीमा के बाद अपना ऑनलाइन आवेदन पत्र जमा किया था।
संस्थान के अनुसार, फॉर्म 1 अप्रैल से 7 मई, 2024 तक ऑनलाइन जमा किए जाने थे और फिर तिथि 14 मई तक बढ़ा दी गई थी। हालांकि, राणे ने 9 जून को फॉर्म जमा किया।
अपनी याचिका में, राणे ने कहा कि आईआईएसईआर एप्टीट्यूड टेस्ट (आईएटी) में उनकी अखिल भारतीय रैंक 10 थी और इसलिए वे निर्धारित कट ऑफ अंकों के अनुसार प्रवेश पाने के पात्र थे।
उन्होंने कहा कि उनकी रैंकिंग के आधार पर, उन्हें प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने और आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
संस्थान ने याचिका का विरोध किया और कहा कि आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि तक, उन्हें लगभग 11,180 फॉर्म प्राप्त हुए थे। संस्थान ने तर्क दिया कि राणे के आवेदन को अब स्वीकार करने का परिणाम आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि को छोड़ना होगा।
पीठ ने कहा कि राणे ने अपना आवेदन पत्र 9 जून को जमा किया था, जो निर्धारित अंतिम तिथि से बहुत बाद का था।
अदालत ने कहा, "यह सच है कि याचिकाकर्ता (राणे) ने अखिल भारतीय स्तर पर अच्छी रैंक हासिल की है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसे प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसने निर्धारित समय सीमा के बाद अपना आवेदन जमा किया था।"
अदालत ने कहा, "केवल सहानुभूति के आधार पर" छात्र को राहत नहीं दी जा सकती। उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा, "ऐसी राहत देने से अन्य आवेदकों के साथ अन्याय होगा।"