एमवीपीआई प्रोग्राम के तहत उठाया गया कदम
यह कदम केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2015 में शुरू किए गए मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI) के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य देशभर में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल डिवाइसों से जुड़ी समस्याओं और खतरों पर नजर रखना है।
31 जुलाई तक कराना होगा कमेटी का पंजीकरण
एनएमसी ने निर्देश दिया है कि सभी मेडिकल कॉलेज 31 जुलाई तक इस कमेटी का गठन कर उसे इंडियन फार्माकोपिया कमीशन (IPC) में पंजीकृत करें। साथ ही, कमेटी के कोऑर्डिनेटर या कन्वीनर और अन्य सदस्यों के नाम भी जमा करने होंगे। आमतौर पर मेडिकल सुपरिंटेंडेंट इस कमेटी के अध्यक्ष होंगे।
क्यों जरूरी है यह कमेटी?
MvPI एक ऐसा कार्यक्रम है जो मेडिकल डिवाइसों से जुड़ी घटनाओं को संगठित ढंग से इकट्ठा करता है, उनका विश्लेषण करता है और आवश्यक कार्रवाई करता है, जिससे मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हो।
इस कार्यक्रम को IPC समन्वित करता है और यह देशभर के मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में स्थापित Medical Device Adverse Events Monitoring Centres (MDMCs) के नेटवर्क के जरिए संचालित होता है।
मेडिकल डिवाइस सेफ्टी सेंटर (MDMC) बनने के फायदे
एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल डिवाइस एडवर्स इवेंट मॉनिटरिंग सेंटर (MDMC) बनने के कई रणनीतिक लाभ बताए हैं:
- शैक्षणिक पहचान: इससे संस्थान की पहचान एक जिम्मेदार और राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य में योगदान देने वाले केंद्र के रूप में होती है।
- पेशेवर विकास: फैकल्टी और छात्रों को डिवाइस सुरक्षा, जोखिम मूल्यांकन और पोस्ट-मार्केट सर्विलांस जैसी प्रक्रियाओं को समझने और उनमें भाग लेने का मौका मिलता है।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार: संस्थानों को MvPI की ट्रेनिंग, रिसोर्सेज और नेशनल-लेवल सहयोग प्राप्त होता है।
- नीति-निर्माण में भागीदारी: ये सेंटर मेडिकल डिवाइसों से जुड़ी नीतियों और नियमों के निर्माण में डेटा और सिफारिशों के जरिए सहयोग कर सकते हैं।
- मरीजों की सुरक्षा: डिवाइस में गड़बड़ियों की पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया से मरीजों के इलाज के परिणाम बेहतर होते हैं।
एनएमसी का नोटिस यहां देखें...