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नीट पीजी और नीट एसएस: अब रैंक से मिलेगा दाखिला, लेकिन आईएमए ने क्यों उठाई योग्यता और मरीज सुरक्षा की चिंता?

Wed, 04 Nov 2026 05:04 PM IST
आकाश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली

सार

मेडिकल दाखिले में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने नीट पीजी और नीट एसएस में प्रतिशत के बजाय रैंक आधारित व्यवस्था को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। आईएमए ने इसका स्वागत किया है, लेकिन योग्यता से समझौता न करने की चेतावनी भी दी है।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Freepik
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विस्तार
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मेडिकल की स्नातकोत्तर और सुपर स्पेशियलिटी (विशेषज्ञता) की पढ़ाई में दाखिले की प्रक्रिया बदल सकती है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने नीट-पीजी और नीट-एसएस में मौजूदा प्रतिशत आधारित व्यवस्था की जगह रैंक आधारित व्यवस्था लागू करने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव के तहत परीक्षा के परिणाम में अब प्रतिशत अंक घोषित करने के बजाय केवल उम्मीदवारों की रैंक घोषित की जाएगी।

क्या है प्रस्ताव?

इस बदलाव का उद्देश्य दाखिले की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है। हालांकि, इस प्रस्ताव को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

  • मौजूदा प्रतिशत आधारित व्यवस्था की जगह रैंक आधारित व्यवस्था लाने का प्रस्ताव है।
  • परीक्षा परिणाम में केवल रैंक घोषित की जाएगी।
  • दाखिले की प्रक्रिया निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर पूरी करने पर जोर है।
  • प्रस्तावित नियमों को अभी अधिसूचित किया जाना बाकी है।

आईएमए ने प्रस्ताव का स्वागत किया, लेकिन किस बात पर जताई चिंता?

भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) ने एनएमसी के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। हालांकि, संगठन ने साफ किया है कि दाखिले की नई व्यवस्था में योग्यता और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। आईएमए का कहना है कि केवल प्रतिशत आधारित व्यवस्था को रैंक आधारित व्यवस्था में बदलने से मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने की समस्या का समाधान नहीं होगा। संगठन ने चेतावनी दी कि खाली सीटें भरने के नाम पर पात्रता के मानकों में मनमाने तरीके से छूट नहीं दी जानी चाहिए। इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

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आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जे नायक ने कहा, "मेडिकल शिक्षा केवल सीटें भरने के बारे में नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसे सक्षम विशेषज्ञ तैयार करना है, जिनके हाथों में लोगों की जिंदगी की जिम्मेदारी होगी।"

उन्होंने जोर दिया कि उम्मीदवारों की योग्यता और न्यूनतम शैक्षणिक क्षमता से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, केवल खाली सीटें भरने के लिए पात्रता के मानकों में मनमानी छूट देकर किसी उम्मीदवार को स्नातकोत्तर मेडिकल शिक्षा के लिए योग्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

खाली मेडिकल सीटों को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने का मुद्दा लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। इन सीटों को भरने के लिए कई बार पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत में कमी की जाती रही है। डॉक्टरों ने इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पात्रता के मानकों में बार-बार कमी करने से ऐसे उम्मीदवार भी दाखिले के योग्य हो सकते हैं, जिनके अंक बेहद कम या यहां तक कि नकारात्मक हों। आईएमए का मानना है कि इस समस्या का समाधान पात्रता के मानक घटाने में नहीं, बल्कि सीटें खाली रहने के असली कारणों का पता लगाने में है।

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आईएमए मुख्यालय के वित्त सचिव डॉ. पीयूष जैन ने कहा, "खाली सीटों की समस्या का समाधान उनके पीछे मौजूद असली कारणों की पहचान करके किया जाना चाहिए। इनमें जरूरत से ज्यादा फीस, पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की कमी, वजीफे में असमानता और कुछ विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में काम करने की प्रतिकूल परिस्थितियां शामिल हैं।"

उन्होंने कहा कि केवल उपलब्ध सीटें भरने के लिए पात्रता की सीमा घटाने के बजाय ऐसे संस्थानों और विशेषज्ञता वाले विषयों को बेहतर बनाना जरूरी है, जिन्हें मेडिकल स्नातक कम पसंद करते हैं।

मेडिकल कॉलेजों में किन कमियों को दूर करने की जरूरत है?

आईएमए ने कहा कि मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने के पीछे कई व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। इन्हें दूर किए बिना केवल दाखिले के नियम बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। संगठन ने कुछ प्रमुख मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया है:

  • ज्यादा फीस: कुछ संस्थानों में फीस अधिक होने के कारण उम्मीदवार दाखिला लेने से बच सकते हैं।
  • बुनियादी सुविधाओं की कमी: मेडिकल कॉलेजों में जरूरी सुविधाओं का अभाव भी दाखिले के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
  • शिक्षकों की कमी: पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता जरूरी है।
  • वजीफे में असमानता: अलग-अलग संस्थानों में मिलने वाले वजीफे में अंतर भी उम्मीदवारों की पसंद को प्रभावित करता है।
  • कामकाज की परिस्थितियां: कुछ विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में काम करने की परिस्थितियां आकर्षक नहीं होतीं।

डॉ. पीयूष जैन ने वजीफे में अंतर दूर करने और मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं के साथ शिक्षकों की उपलब्धता बेहतर बनाने पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि इन सुधारों से उम्मीदवारों के बीच कम पसंद किए जाने वाले विषयों और संस्थानों को भी आकर्षक बनाया जा सकता है।

नई व्यवस्था से काउंसलिंग प्रक्रिया में क्या फायदा होगा?

एनएमसी की प्रस्तावित व्यवस्था उन सिफारिशों का हिस्सा है, जो 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने सुप्रीम कोर्ट को दी हैं। इसका एक प्रमुख उद्देश्य काउंसलिंग के अलग-अलग चरणों के बीच होने वाली देरी को कम करना है। साथ ही, दाखिले की पूरी प्रक्रिया निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर पूरी करने की कोशिश की जाएगी। आईएमए ने भी इस दिशा में पारदर्शी, एकसमान और समयबद्ध काउंसलिंग व्यवस्था की जरूरत बताई है।

संगठन के मुताबिक, दाखिले की प्रक्रिया तय समय पर पूरी होनी चाहिए, ताकि उम्मीदवारों के बीच अनिश्चितता न रहे और शैक्षणिक सत्र शुरू होने में देरी न हो। आईएमए ने यह भी कहा है कि प्रस्तावित नियमों को अंतिम रूप देने से पहले सभी संबंधित पक्षों से चर्चा की जानी चाहिए। इनमें शामिल हैं:

  • भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए)
  • मेडिकल कॉलेज
  • संकाय सदस्य और शिक्षक
  • रेजिडेंट डॉक्टर

क्या रैंक आधारित व्यवस्था से पात्रता में छूट देने की जरूरत खत्म हो जाएगी?

एनएमसी की प्रस्तावित व्यवस्था का एक अहम पहलू यह भी है कि आगे की काउंसलिंग के दौरान खाली सीटें रहने पर पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत को घटाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अलग अनुमति लेने की जरूरत खत्म हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में जब सीटें खाली रह जाती हैं, तब बाद के काउंसलिंग चरणों में पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत में कमी करने के लिए इस तरह की अनुमति लेने की व्यवस्था है।

रैंक आधारित व्यवस्था लागू होने पर इस प्रक्रिया में बदलाव की उम्मीद है। हालांकि, आईएमए ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पूरी किए बिना उम्मीदवारों को दाखिला मिल जाए।

संगठन के मुताबिक, स्नातकोत्तर और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले उम्मीदवारों में अपनी पढ़ाई और भविष्य की चिकित्सकीय जिम्मेदारियां निभाने के लिए जरूरी शैक्षणिक क्षमता होनी चाहिए।

फिलहाल एनएमसी ने रैंक आधारित व्यवस्था को केवल सैद्धांतिक मंजूरी दी है। अंतिम नियम अभी अधिसूचित नहीं हुए हैं। इससे पहले प्रस्तावित नियमों का मसौदा जारी किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी।

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