मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने इसे आधार बनाते हुए चार निर्देश दिए जो देशभर में मान्य होंगे।
1. मामलों का तुरंत निपटारा : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'जब कोई अभ्यर्थी बिना देर किए कोर्ट में याचिका लगाता है, तो प्राथमिकता के साथ उसके मामले के निपटारे के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।'
ये भी पढ़ें : पहले दिल्ली में नहीं था हिंसा के कारण चर्चा में आया जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय, जानें इतिहास
2. अतिरिक्त सीट जोड़ें : अपवाद की कुछ परिस्थितियों में, अगर कोर्ट याचिका करने वाले अभ्यर्थी को कानूनी तौर पर सही पाता है, तो उसके लिए कॉलेज में सीट बढ़ाए जाने का आदेश दिया जा सकता है। हालांकि एक या दो से ज्यादा सीटें नहीं बढ़ा सकते। साथ ही ये भी ध्यान रखना होगा कि कॉलेज में दाखिले की अंतिम तिथि से एक महीने बाद तक ही सीट बढ़ाकर दाखिला देने का निर्देश दिया जा सकता है। वो भी दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में।
इसके अलावा कोर्ट मेरिट में सबसे नीचे (श्रेणीवार) के अभ्यर्थी का दाखिला रद्द करने का भी आदेश दे सकता है, अगर याचिकाकर्ता उससे ज्यादा मेरिट पर है। हालांकि दाखिला रद्द करने का आदेश देने से पहले संबंधित विद्यार्थी को उसकी बात रखने का अवसर देना जरूरी होगा।
3. अगले साल दाखिला : अगर अभ्यर्थी कानूनी तौर पर सही है, लेकिन कोर्ट को लगता है कि उस साल किसी भी तरीके से याचिकाकर्ता को दाखिले की राहत नहीं दी जा सकती, तो ठीक अगले साल दाखिला दिए जाने का फैसला सुनाया जा सकता है। या फिर अगर ये पाया गया कि मेधावी छात्र को गलत तरीके से प्रवेश देने से मना किया गया है, तो संस्थान के मैनेजमेंट कोटा सीटों की संख्या कम की जा सकती है।
ये भी पढ़ें : पत्ते तोड़ने पर भी पौधों को होता है दर्द, सुनी गई कराहने की आवाज
4. मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि संस्थान की गलती के कारण किसी अभ्यर्थी का साल बर्बाद होने पर मुआवजा एक अतिरिक्त सुधार के तौर पर दिया जा सकता है। लेकिन यह पूर्ण सुधार नहीं हो सकता।
इसके साथ-साथ कोर्ट ने कहा कि ये निर्देश मेडिकल के पीजी कोर्सेज में दाखिले के समय लागू नहीं होंगे।