बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जेएनयू, तेजपुर विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची विश्वविद्यालय, बैंगलोर विश्वविद्यालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति, एनआईटी जालंधर के निदेशक, राज्यपाल, आईआईएम काशीपुर, आईसीएसएसआर सचिव और एनआईओएस अध्यक्ष और अन्य बोर्ड अध्यक्ष शामिल हैं।
एनसीईआरटी को बदनाम करने का प्रयास
पिछले तीन महीनों में, एनसीईआरटी, एक प्रमुख सार्वजनिक संस्थान को बदनाम करने और पाठ्यक्रम अद्यतन करने के लिए बहुत आवश्यक प्रक्रिया को बाधित करने के जानबूझकर प्रयास किए गए हैं। बयान में कहा गया है, इस नाम-वापसी तमाशे के माध्यम से मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करने वाले शिक्षाविद यह भूल गए हैं कि पाठ्यपुस्तकें सामूहिक बौद्धिक जुड़ाव और कठोर प्रयासों का परिणाम हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पहुंचा रहे बाधा
बयान में कहा गया है कि जिन विद्वानों ने पाठ्यपुस्तक में बदलाव का सुझाव दिया है, उन्होंने समकालीन ज्ञान की आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम की सामग्री को तर्कसंगत बनाया है। प्रत्येक नई पीढ़ी को मौजूदा ज्ञान आधार में कुछ जोड़ने/हटाने का अधिकार है। कुछ बुद्धिजीवी गलत सूचनाओं, अफवाहों और झूठे आरोपों के माध्यम से, वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के कार्यान्वयन को पटरी से उतारना चाहते हैं और एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के अपडेशन को बाधित करना चाहते हैं।
इन्होंने की थी नाम हटाने की मांग
कुछ दिनों पहले, योगेंद्र यादव और सुहास पलशिकर जैस राजनीतिक विचारकों जो एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक विकास समिति का हिस्सा थे, ने परिषद से पाठ्यपुस्तकों के मूल ग्रंथों के कई मूल संशोधनों से उनका नाम हटाने के लिए कहा था। इसके बाद जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर कांति प्रसाद बाजपेयी, अशोका यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रताप भानु मेहता, सीएसडीएस के पूर्व निदेशक राजीव भार्गव, नीरजा गोपाल जायल, निवेदिता मेनन, विपुल मुद्गल, केसी सूरी और पीटर रोनाल्ड डिसूजा आदि ने अपने नाम हटाने का आग्रह किया था।