पश्चिम और पूर्व भारत का प्रतिनिधित्व
होयसलों द्वारा बेलूर और हलेबिडु में निर्मित बारीक नक्काशी वाले मंदिरों को क्षेत्रीय कला का श्रेष्ठ उदाहरण बताया गया है। पूर्वी गंग वंश को पुरी के जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसी भव्य रचनाओं के लिए स्थान दिया गया है।
उत्तर-पूर्व भारत भी शामिल:
कम रूप से उल्लेखित ब्रह्मपाल वंश को कामरूप (वर्तमान असम) के इतिहास में उनकी भूमिका के आधार पर प्रमुखता से
शामिल किया गया है। किताब में भंजा, चापा, गुहिल, कलचुरी, मैत्रक, मौखरी, शिलाहार, सोमवंशी, तोमर, चैहमान सहित कई अन्य राजवंशों का योगदान भी जोड़ा गया है। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और बसवेश्वर जैसे आध्यात्मिक एवं सामाजिक सुधारकों का उल्लेख इस दौर की बौद्धिक समृद्धि दर्शाता है।
मंदिर स्थापत्य पर विशेष जोर
एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर, चोल काल का बसवेश्वर मंदिर और चंदेलों का लक्ष्मण मंदिर स्थापत्य सौंदर्य और इंजीनियरिंग कौशल के उदाहरणों के रूप में शामिल किए गए हैं।
पहले की किताबों में उत्तर भारत और दिल्ली सल्तनत की इमारतों पर अधिक जोर था, जबकि नई पुस्तक क्षेत्रीय कला और धार्मिक परंपराओं को केंद्र में रखती है।