मूल समानता का अधिकार
भारत के संविधान के अनुसार देश का हर नागरिक उसके लिए एक समान है। यहां किसी भी शख्स से उसकी जाति, लिंग, धर्म आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। हालांकि, कई ऐसे अपवाद थे जहां भेदभाव नजर आ जाते थे। लेकिन इस देश के संविधान की ही खूबी है जिसने इन अपवादों को समय-समय पर खत्म किया है। उदाहरण स्वरूप लड़कियों को सेना के शॉर्ट सर्विस कमीशन में स्थायी कमीशन और एनडीए में एंट्री नहीं मिलती थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही मामलों में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस भेदभाव को खत्म कर दिया है। यह सभी संविधान के अनुच्छेद 14 में निर्देशित समानता के अधिकार के अंतर्गत किया गया है।
रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) में कहा गया है कि देश के हर नागरिक को फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन का अधिकार दिया गया है। यानि कि देश की जनता को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। बता दें कि इस अधिकार के अनुसार भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए संकल्पित है। देश में प्रेस, सिनेमा आदि की स्वतंत्रता भी इसी के अंतर्गत आती है। हालांकि, इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन की एक सीमा भी है।
अपने धर्म का पालन करने का अधिकार
भारत के संविधान निर्माताओं ने देश को किसी एक धर्म के लिए नहीं घोषित किया। भारत एक पंथ निरपेक्ष देश है। यहां विभिन्न पंथ-धर्मों के लोग निवास करते हैं। यही कारण है कि संविधान में सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का सामान अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ 1994 के मामले में यह कहा था कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढांचा है, सभी धर्म और धार्मिक समुदायों के साथ समान व्यवहार करता है, धर्म व्यक्तिगत विश्वास की बात है उसे अलौकिक क्रियाओं में नहीं मिलाया जा सकता है। हालांकि, कई ऐसे विवाद हैं जिनपर अब भी बहस जारी है। कर्नाटक हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में जल्द ही सुनवाई होनी है।
निजता का अधिकार
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। कोर्ट ने यह फैसला देश के अतीत और भविष्य दोनों को ही ध्यान में रखते हुए किया था। यह देश के लोकतंत्र में एक बड़ा अध्याय था। इस अधिकार के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में निजता का अधिकार भी शामिल है। निजता प्रत्येक व्यक्ति की मूल गरिमा के लिये एक महत्त्वपूर्ण विषय है। चाहे वह डेटा संरक्षण का अधिकार हो या फिर इंसान के व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न निजी पहलू। इन सभी को निजता के अधिकार के तहत सुरक्षा प्रदान की गई है।
मौलिक अधिकार प्राप्त करने का अधिकार
भारत के संविधान का अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों) अपने आप में संविधान निर्माताओं की दूरगामी सोच को दर्शाता है। हमारे संविधान की खूबी यह है कि मौलिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए जनता सर्वोच्च न्यायालय जा सकती है। क्योकि यह भी एक मौलिक अधिकार की श्रेणी में आता है। यही कारण है कि डॉ भीम राव आंबेडकर ने इस अनुच्छेद को संविधान का दिल और आत्मा बताया था। बता दें कि अगर किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन किया जा रहा है तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट संबंधित अधिकारियों को रिट जारी कर के उस शख्स को उसके अधिकार दिलाता है। इस मामले में पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने, राज्य को अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजे का भुगतान करने, विस्थापित आदिवासियों को फिर से बसाने आदि कई उदाहरण मौजूद हैं।