कोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि यह मामला दो वर्षों से लंबित है, लेकिन अब तक राज्य सरकार ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए मौखिक टिप्पणी कि दो साल में आपने कुछ नहीं किया। अपनी प्रक्रिया को सक्रिय करें, वरना हम अंतरिम राहत पर विचार करेंगे।
क्या कहती है याचिका?
- याचिका में कहा गया है कि किसी भाषा को जबरन थोपना छात्रों की भाषा चयन की स्वतंत्रता पर चोट है।
- यह नियम उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और करियर पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
- याचिका में यह भी कहा गया है कि गैर-कन्नड़ भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों के रोजगार पर भी संकट खड़ा हो सकता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का हवाला देते हुए कहा गया कि इसमें किसी भाषा को जबरन थोपने की मनाही है।
- केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि NEP 2020 किसी एक भाषा को अनिवार्य करने का समर्थन नहीं करता।
याचिकाकर्ताओं ने नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल इस पर कोई राहत नहीं दी है। अब राज्य सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करना होगा, उसके बाद ही मामला आगे बढ़ेगा।