ऊर्जा-द्रव्यमान नियम कब पेश किया गया था?
27 सितंबर 1905 को जर्मन मूल के भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टाइन का एक शोध-पत्र Annalen der Physik के संपादक के पास पहुंचा था। इसका शीर्षक था- Does the Inertia of a Body Depend Upon Its Energy-Content? यानी क्या किसी पिंड का जड़त्व उसकी ऊर्जा-सामग्री पर निर्भर करता है? इसी छोटे से शोध-पत्र में आइंस्टाइन ने द्रव्यमान और ऊर्जा के संबंध को सामने रखा।
क्या है E=mc²?
E = mc² को बहुत आसान भाषा में समझें तो यहां-
E = ऊर्जा
m = द्रव्यमान
c = निर्वात में प्रकाश की गति
अंतरराष्ट्रीय इकाई प्रणाली के अनुसार निर्वात में प्रकाश की गति 299,792,458 मीटर प्रति सेकंड है। अब ध्यान दीजिए कि समीकरण में इस गति का वर्ग यानी c² है। यानी यह नियम कहता है कि बहुत छोटे द्रव्यमान के बराबर ऊर्जा की मात्रा भी बहुत बड़ी हो सकती है।
1905 में आइंस्टाइन ने क्या बताया था?
1905 आइंस्टाइन के वैज्ञानिक जीवन का बेहद महत्वपूर्ण साल था। इस साल उन्होंने भौतिकी से जुड़े चार महत्वपूर्ण शोध-पत्र प्रकाशित किए। इन्हीं में विशेष सापेक्षता से जुड़े काम और द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध वाला शोध-पत्र शामिल था।
27 सितंबर 1905 वाले शोध-पत्र में आइंस्टाइन ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि कोई पिंड ऊर्जा विकिरण के रूप में बाहर निकालता है तो उसके द्रव्यमान में भी कमी आती है। उनके मूल निष्कर्ष को आज हम सरल रूप में E=mc² के रूप में जानते हैं।
आइंस्टाइन के उस मूल शोध-पत्र में आज के पाठ्यपुस्तक वाले रूप में “E=mc²” समीकरण नहीं लिखा था। उन्होंने द्रव्यमान और ऊर्जा के संबंध को अपने निष्कर्ष के रूप में बताया था। प्रसिद्ध समीकरण उसी संबंध को संक्षिप्त रूप में व्यक्त करता है।
27 सितंबर 1905 का दिन क्यों याद किया जाता है?
1905 में आइंस्टाइन ने भौतिकी के कई पुराने सवालों को नए तरीके से देखा। उनके द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध वाले शोध-पत्र ने यह दिखाया कि किसी पिंड की ऊर्जा-सामग्री और उसका द्रव्यमान आपस में जुड़े हैं।
आज E=mc² आधुनिक भौतिकी के सबसे प्रसिद्ध समीकरणों में से एक है। इसका इस्तेमाल परमाणु भौतिकी से लेकर तारों में होने वाली प्रक्रियाओं को समझने तक कई क्षेत्रों में किया जाता है।