दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है कि राजधानी में 50 फीसदी से ज्यादा निजी स्कूल अपने शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा के अनुसार वेतन नहीं दे रहे हैं। इस पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने कहा कि शिक्षक पढ़े लिखे हैं और अपनी मांगों को लेकर अदालत में याचिका दाखिल कर सकते हैं।
इस मामले में शिक्षा विभाग ने इन सभी सकूलों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है। शिक्षा विभाग का कहना है कि जो स्कूल सांतवे वेतन आयोग के हिसाब से सैलरी नहीं देंगे उन स्कूलों की मान्यता भी रद्द की जा सकती है। नोटिस के जवाब में ज्यादातर स्कूलों ने दावा किया है कि उनकी फीस इतनी ज्यादा नहीं है कि वे अपने शिक्षकों को वेतन बढ़ाकर दें पाएं।
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एफेडेविट में प्राइवेट स्कूलों की एक्शन कमिटी ने कहा कि उन्हें सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए स्कूल की फीस में 25 फीसदी की बढ़ोतरी करनी होगी। बिना फीस बढ़ाएं टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ को 7वें वेतन आयोग क अनुसार सैलरी देना पाना मुश्किल होगा। स्कूलों ने कहा कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए राज्य सरकार से भी कई बार की फीस में बढ़ोतरी को लेकर अनुमति मांगी गई है, लेकिन उन्हें इजाजत नहीं दी।
जिन स्कूलों को नोटिस जारी किए गए है उनका जवाब आने के बाद उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि सरकार ने हलफनामा उस याचिका के जवाब में दाखिल किया था, जिसमें कोर्ट से स्कूलों को संशोधित वेतन देने का निर्देश देने के लिए कहा गया था। याचिका में कहा गया था कि सरकारी और निजी स्कूलों के टीचरों के वेतन में भेदभाव किया जा रहा है।
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