इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी में होने वाला है नेशनल सेमिनार
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लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक है न्यायपालिका। भारतीय लोकतंत्र की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो इसे अन्य लोकतांत्रिक देशों से भिन्न करती हैं। भारतीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभ एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। तीनों एक साथ परस्पर आकर लोकतंत्र की गरिमा को बचाए रखते हैं।
निष्पक्ष व स्वतंत्र न्यायपालिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ होने के साथ ही न्याय के लिए भी सदा तत्पर रहती है। भारतीय संविधान ने अपने अनुच्छेद 124(2) व 217(1) में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक खास व्यवस्था बना रखी है। जो कि कार्यपालिका व न्यायपालिका के संतुलित सहयोग से कार्य करता है। लेकिन ये संतुलन 2nd जजेस केस (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारतीय यूनियन) और प्रेसीडेंशियल संबंध में सुप्रीम कोर्ट की राय के बाद डगमगा गया।
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु कॉलेजियम का गठन किया गया। इस प्रकार न्यायपालिका ने संविधान निर्माताओं के विचारों को, संवैधानिक लोकतंत्र पर न्यायिक वर्चस्व स्थापित करके खारिज कर दिया। न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे अति महत्वपूर्ण बिंदु पर समाज के किसी हिस्से में कोई चर्चा नहीं होती। यहां तक कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में व्याप्त अपारदर्शिता पर कोई भी राजनीतिक दल या कोई सामाजिक कार्यकर्ता चर्चा नहीं करता।
इसीलिए भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का विश्लेषण करने के उद्देश्य से इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी के विधि विभाग ने दो दिवसीय नेशनल सेमिनार का आयोजन किया है। यह निश्चित तौर पर विधि विभाग के छात्रों को शिक्षित और जागरूक करेगा। साथ ही भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मुद्दों पर भी उनके ज्ञान को बढ़ाएगा। 4 और 5 अक्तूबर को होने वाले नेशनल सेमिनार 'कॉन्स्टीट्यूशनालिटी ऑफ कॉलेजियम सिस्टम इन द अप्वाइंटमेंट ऑफ हायर जूडिश्यरी फंक्शनरीज इन इंडिया' में भाग लेने के लिए इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर जाकर रजिस्ट्रेशन करें। आप ईमेल आई डी पर सम्पर्क भी कर सकते हैं।
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