हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बदलाव तथ्यों पर आधारित होने चाहिए।
पीटीआई के संपादकों के साथ एजेंसी के मुख्यालय में बातचीत में डोभाल ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मौजूदा पाठ्यपुस्तकों में जो कुछ भी है, वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं है और उस पर अच्छी तरह से शोध किया जाना चाहिए। लेकिन अगर बाद में कुछ तथ्य सामने आते हैं और यह सोचा जाता है कि उन्हें छात्रों को पढ़ाया जाना चाहिए, तो इसे "भगवाकरण" के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, उन्होंने कहा।
उन्होंने कहा, "उदाहरण के लिए, मुगल साम्राज्य 1700 के आसपास खत्म हो गया और 1857 में अंग्रेज आए, फिर बीच के समय में किसी ने हम पर शासन किया होगा, लेकिन हम सुनते आ रहे हैं कि हम 1,000 साल से भी ज्यादा समय तक पहले मुगलों ने और फिर अंग्रेजों गुलाम रहे। हो सकता है कि 100 साल से भी ज्यादा समय के दौरान भारत का पुनरुत्थान हुआ हो, लेकिन जैसे ही यह विचार सामने आता है, आलोचक कहते हैं कि भगवाकरण हो गया है।" बैंकर से राजनीतिक विचारक बने इस व्यक्ति ने कहा कि औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का एक हिस्सा ऐसे लोगों को तैयार करना था जो आत्म-गौरव में विश्वास नहीं करते।
आगे कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि बदलाव तथ्य आधारित नहीं होने चाहिए, लेकिन अगर देश के इतिहास या भूगोल के बारे में कोई ऐसा हिस्सा है जो गर्व पैदा करता है, तो उसे क्यों नहीं उजागर किया जाना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि यह भगवाकरण है।"
डोभाल की यह टिप्पणी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव पर चल रही बहस के बीच आई है, जिसमें विपक्ष ने भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर इतिहास बदलने का आरोप लगाया है।
डोभाल ने कहा, "मैं शिक्षाविद् नहीं हूं, लेकिन मैं देश की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा रहा हूं।"