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CBSE Sugar Board: अब लगेगी सेहत वाली क्लास! सीबीएसई स्कूलों में लगेंगे 'शुगर बोर्ड; मिलेगा मिठास का सही पाठ

Sun, 25 May 2025 04:27 PM IST
शिवम गर्ग एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

CBSE Sugar Board Initiative 2025: सीबीएसई ने स्कूलों में 'शुगर बोर्ड' लगाने का निर्देश दिया है ताकि बच्चे और अभिभावक चीनी की खपत पर जागरूक फैसले ले सकें। यह कदम बचपन में मोटापे और डायबिटीज से बचाव में अहम साबित हो सकता है।
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CBSE Sugar Boards - फोटो : CBSE
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विस्तार
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CBSE Sugar Board Initiative 2025: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा स्कूलों को चीनी की खपत को सीमित करने के महत्व को रेखांकित करने के लिए समर्पित 'शुगर बोर्ड' स्थापित करने का निर्देश दिए जाने के बाद, विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम छात्रों और अभिभावकों दोनों को चीनी के सेवन के बारे में सूचित विकल्प बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बच्चों में मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज़ और अन्य मेटाबॉलिक बीमारियों से बचाने में कारगर होगा।

क्या है ‘शुगर बोर्ड’ पहल?

सीबीएसई के इस नए दिशा-निर्देश के अनुसार, स्कूलों में प्रमाणिक जानकारी देने वाले बोर्ड लगाए जाएंगे जो यह दर्शाएंगे कि रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में कितनी छिपी हुई चीनी मौजूद होती है। बच्चों को बताया जाएगा कि पैकेज्ड फूड, फ्लेवर्ड योगर्ट, जूस और ब्रेकफास्ट सीरियल्स में भी शुगर होती है, जो अक्सर नजर नहीं आती।

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यह भी पढ़ें- प्रधानमंत्री मोदी ने 'शुगर बोर्ड' पहल की सराहना की, बोले- बच्चों में बढ़ रही स्वास्थ्य जागरूकता

विशेषज्ञों की राय: क्यों जरूरी है यह कदम?

CBSE Sugar Board - फोटो : Amar Ujala Graphics

एम्स दिल्ली में एंडोक्राइनोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. आर गोस्वामी ने इस कदम को एक अच्छी पहल बताया। उन्होंने कहा कि कार्बोहाइड्रेट, खास तौर पर कोल्ड ड्रिंक और मैदा युक्त खाद्य पदार्थ, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की तुलना में ऊर्जा और कैलोरी के अपेक्षाकृत सस्ते स्रोत हैं। इसलिए, एक ही राशि खर्च करने पर प्रोटीन युक्त भोजन की तुलना में कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन की अधिक मात्रा मिलती है। परिणामस्वरूप, जब कोई व्यक्ति ऐसे कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन का अधिक सेवन करना शुरू करता है, साथ ही व्यायाम की कमी के कारण मोटापा बढ़ता है। हालांकि, ऐसा कोई डेटा नहीं है जो दिखाता हो कि बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) बनाए रखने पर कम मात्रा में मिठाई खाने से मधुमेह होता है। इसलिए कोई मिठाई खा सकता है, लेकिन कम मात्रा में।

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CBSE Sugar Board - फोटो : Amar Ujala Graphics

दिल्ली के मैक्स हेल्थकेयर में डायटेटिक्स की क्षेत्रीय प्रमुख डॉ. रितिका समद्दर ने कहा कि सीबीएसई द्वारा शुगर बोर्ड स्थापित करना और छात्रों को चीनी के सेवन और इसके छिपे स्रोतों के बारे में सूचित विकल्पों के बारे में शिक्षित करना एक शानदार पहल है। अत्यधिक चीनी और मीठे पेय पदार्थों का सेवन केवल खाली कैलोरी है और बच्चों में यह एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय है। अधिक सेवन से मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, दांतों में सड़न, व्यवहार और संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं। डब्ल्यूएचओ की सिफारिश है कि बच्चों को अतिरिक्त चीनी से दैनिक कैलोरी का 10 प्रतिशत से कम सेवन करना चाहिए या अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभों के लिए आदर्श रूप से 5 प्रतिशत से कम।

बच्चों और माता-पिता दोनों के लिए फायदेमंद

इस पहल से बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि उनके बच्चों की डायट में छुपी हुई चीनी कितनी है और उससे किस प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। WHO के अनुसार, बच्चों को अपनी कुल कैलोरी का सिर्फ 5% ही ऐडेड शुगर से लेना चाहिए, लेकिन भारत में बच्चे इससे तीन गुना ज़्यादा शुगर ले रहे हैं।

क्या होंगे ‘शुगर बोर्ड’ के फायदे?

  • स्कूल कैंपस में लगेंगे इंफोग्राफिक्स और शुगर कंटेंट चार्ट्स
  • दिखाया जाएगा कि लोकप्रिय स्नैक्स में कितनी चीनी होती है
  • बच्चों के लिए होंगी इंटरऐक्टिव वर्कशॉप्स और खेल आधारित लर्निंग
  • बीएमआई (BMI) और हेल्थ अवेयरनेस से संबंधित जानकारी भी दी जाएगी

27,000 CBSE स्कूलों में बदलाव की शुरुआत

सीबीएसई से जुड़े 27,000 से अधिक स्कूलों में यह निर्देश लागू होगा। इसका असर 25 करोड़ से ज्यादा स्कूली बच्चों और उनके परिवारों तक हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ और फॉरएवर हेल्दी इंडिया अभियान की संस्थापक ईशा वशिष्ठ ने सीबीएसई के दृष्टिकोण की प्रशंसा करते हुए इसे "एक राष्ट्रीय आंदोलन बनने की ओर अग्रसर" बताया। निवारक स्वास्थ्य सेवा के लिए समर्पित एक पोषण विशेषज्ञ के रूप में और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मूल कारणों को संबोधित करते हुए, मैं स्कूलों में शुगर बोर्ड शुरू करने के सीबीएसई के दूरदर्शी कदम का दृढ़ता से समर्थन करता हूं। यह पहल केवल एक प्रतीकात्मक इशारा नहीं है, यह स्कूल संस्कृति में स्वास्थ्य साक्षरता के एकीकरण का प्रतीक है।
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