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Career Tips: बहस को हार-जीत का मंच न बनाएं, बल्कि नए दृष्टिकोण को अपनाने का अवसर समझें

Mon, 05 Jan 2026 11:13 AM IST
आकाश कुमार जोना बर्जर, हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू

सार

Harvard Business Review: किसी की सोच बदलने की शुरुआत तर्कों से नहीं, बल्कि सुनने, समझने और सम्मान देने से होती है। सहानुभूति, खुले प्रश्न और साझा बिंदुओं के जरिए संवाद को सहयोगी बनाया जाए, तो व्यक्ति आत्मनिरीक्षण करता है और नए विचारों के लिए खुलता है।
 
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Career Tips - फोटो : Freepik
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विस्तार
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जब हम सामने वाले को पहले सुनते हैं, उसके दृष्टिकोण को सम्मान देते हैं और यह दिखाते हैं कि उसकी राय हमारे लिए मायने रखती है, तभी संवाद की सही नींव बनती है। किसी भी इन्सान की सोच या मत बदलने की प्रक्रिया की शुरुआत विश्वास और समझ से होती है, न कि तर्कों की बौछार से। ध्यान रहे, बहस के दौरान सहानुभूति दिखाना, खुले प्रश्न पूछना जैसे 'आप ऐसा क्यों सोचते हैं?' और साझा बिंदुओं को तलाशना जरूरी हो जाता है। 

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ऐसा करने से व्यक्ति आत्मनिरीक्षण करता है, उसे अपनी धारणाओं पर दोबारा सोचने का अवसर मिलता है और वह नए विचारों को अपनाने के लिए अधिक खुला हो जाता है। यह तरीका किसी बहस को जीतने का नहीं, बल्कि एक साझा समझ और खोज की ओर बढ़ने का होता है।

Career Tips - फोटो : Freepik

तर्क स्पष्ट करने का अवसर दें

संवाद की शुरुआत विश्वास और तालमेल से होती है, जिसमें सामने वाले को शर्मिंदा किए बिना सकारात्मक संबंध बनाना जरूरी है। खुले प्रश्न पूछें, ध्यान से सुनें और सहानुभूति दिखाएं, ताकि वे सहज होकर अपने विचार साझा करें और नए दृष्टिकोण स्वीकार करें।

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वास्तविक उदाहरणों का उपयोग

सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने के लिए साझा आधार खोजना बेहद जरूरी है, ताकि समान मूल्यों या अनुभवों के सहारे बातचीत आगे बढ़ सके। इसके साथ ही, कहानियों और वास्तविक उदाहरणों का उपयोग करना प्रभावी होता है। टकराव से बचते हुए, जब धीरे-धीरे प्रासंगिक उदाहरण या तथ्य रखे जाते हैं, तो वे मन में संदेह विकसित करते हैं और व्यक्ति को अपने दृष्टिकोण पर स्वयं विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे बदलाव की संभावना स्वाभाविक रूप से बनती है।

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सहयोग दिखाएं

संवाद में मार्गदर्शन का मतलब यह नहीं कि अपनी राय थोप दी जाए, बल्कि सामने वाले को विभिन्न विकल्पों और उनके परिणामों को स्वयं समझने में मदद करना है। इस दौरान केवल अंतिम निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि उस निष्कर्ष तक पहुंचने की उनकी तर्क-प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है। जब चर्चा को विरोध या जीत-हार की बहस की बजाय सहयोगी प्रयास के रूप में पेश किया जाता है, तो सामने वाला सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है, जिससे वह खुलकर सोचने और समझने के लिए तैयार होता है।
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सम्मान के साथ चर्चा करें

संवाद में सीधे यह कहना कि सामने वाला गलत है, अक्सर उल्टा असर करता है और व्यक्ति रक्षात्मक हो जाता है। केवल तथ्यों का अंबार भी गहरी मान्यताओं को बदलने में कारगर नहीं होता, क्योंकि ये मान्यताएं भावनाओं और पहचान से जुड़ी होती हैं। इसलिए बहस में व्यक्ति की पहचान पर सवाल करने के बजाय उसके तर्क और विचारों पर सम्मान के साथ चर्चा करना अधिक प्रभावी होता है।
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