बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर भर्ती के लिए जारी विज्ञापन संख्या 2/2016-2017 को गलत तरीके से आरक्षण लागू करने के कारण रद्द कर दिया गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे विश्वविद्यालय को एक इकाई मानकर सभी पदों पर एक साथ आरक्षण लागू करना नियमानुसार गलत है।
ऐसा करने से जटिलताएं पैदा होंगी। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि नए सिरे से विभागवार/विषयवार आरक्षण लागू करे। कोर्ट ने उपरोक्त विज्ञापन के आधार पर की गई नियुक्तियां भी रद्द कर दी हैं। विवेकानंद तिवारी और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति डीएस त्रिपाठी की बेंच ने यह फैसला दिया।
फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि विश्वविद्यालय जैसी उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण लागू करने के औचित्य पर सरकार को विचार करना चाहिए। कोर्ट को बताया गया कि बीएचयू टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टॉफ की भर्ती के लिए विज्ञापन संख्या 2-2016-17 जारी किया था, जिसे विवेकानंद तिवारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी थी।
अधिवक्ता विमलेंदु त्रिपाठी का कहना था कि बीएचयू को एक इकाई मानते हुए विज्ञापन लागू किया जा रहा है, जबकि राज्य विश्वविद्यालयों में विभागवार रिक्तियों पर आरक्षण लागू होता है। बीएचयू द्वारा लागू किया जा रहा आरक्षण गलत है। कोर्ट ने प्रकरण को विचारणीय मानते हुए टीचिंग स्टॉफ के चयन पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से जवाब मांगा था।
फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने यूजीसी द्वारा तय गाइडलाइन 6(सी)8(ए)(5) और इसके संबंध में जारी 25 अगस्त 2006 के पत्र को भी रद्द कर दिया है। उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण लागू करने के औचित्य पर विस्तार से विचार करते हुए पीठ ने सुप्रीमकोर्ट के इंदिरा साहनी केसद और एम नागराजन केस सहित तमाम न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए आरक्षण व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
पीठ ने कहा कि हम उच्च शिक्षण संस्थाओं में अध्यापकों केपदों पर आरक्षण लागू करने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं। विश्वविद्यालयों द्वारा उच्च शिक्षा के साथ शोधकार्य कराए जाते हैं। इनमें साइंस और टेक्नोलॉजी तथा विज्ञान के क्षेत्र में गठित नेशनल काउंसिल, इलेक्ट्रनिक्स, एटामिक एनर्जी और एडवांस मेडिकल साइंस जैसे विषय भी पढ़ाए जाते हैं।
कोर्ट ने सवाल उठाए हैं कि क्या उच्च शिक्षण संस्थाओं में टीचिंग के पदों पर आरक्षण अनिवार्य है, क्या आरक्षण को आंखें मूंद बिना पदों, विभागों और विषय को चिन्हित किए लागू किया जाना चाहिए और क्या इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस प्रश्नों पर इंदिरा साहनी केस और एम नागराजन केस में संविधान पीठ के निर्णयों के मद्देनजर विचार करने की सलाह दी है।