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दर्जनों बार फेल होने के बावजूद नहीं मानी हार, बने दुनिया के सबसे बुद्धिमान शख्स

Fri, 07 Dec 2018 03:10 PM IST
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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अल्बर्ट आइंस्टीन को मानव इतिहास का सबसे बुद्धिमानी व्यक्ति कहा जाता था। उन्होंने 20वीं सदी के प्रारंभिक समय में विज्ञान जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई और आज भी उनका नाम विज्ञान के क्षेत्र में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है ये तो सभी को पता है कि इन्होंने कई खोज की जिनके आधार पर समय, अंतरिक्ष और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत दिए। पर वे महान और लोकप्रिय इंसान भी थे। कहा जाता है जब वे बाहर निकलते थे तो सड़क पर ही लोग उनसे उनके सिद्धांतों के बारे में पूछना शुरू कर देते थे। इससे परेशान होकर उन्होंने एक रास्ता निकाला। जब भी कोई उनसे पूछता की आप वहीं हैं तो वे नाकार जाते। वे हमेशा कहते थे कि मेरे अंदर जिज्ञासा कूट-कूट कर भरी है।
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आपको बता दें कि अल्बर्ट आइंस्टीन बचपन में इतने बुद्धिमान नहीं थे। पढ़ाई में उनके कमजोर प्रदर्शन ने उन्हें मंगबुद्धि का टैग दे दिया। जब उनका जन्म हुआ था तो वे समान्य बच्चे से काफी अलग थे। उनके सिर का आकार काफी बड़ा था। जो उन्हे सारे बच्चों से अलग करता था। मात्र 4 वर्ष की उम्र में उन्होंने बोलना शुरू किया। न वो बच्चों के साथ खेलते थे और न ही उनके साथ रहते थे। अपनी अलग दुनिया में खोए रहते थे। इस दुनिया में विचार का एक ऐसा संगम था जिसमें पेड़-पौधे और ब्रहमांड की बाते छिपी थीं। मात्र 5 साल की उम्र से ही उनके अंदर विज्ञान के प्रति रुचि दिखने लगी थी। उनके अंदर बहुत सारे प्रश्न चलते थे। उनके पिता ने उन्हें एक मैग्नेटिक कंपस लाकर दिया था। जिसकी सुई हमेशा उत्तर की और रुकती थी। वे सोचते थे कि ऐसा आखिर क्यों होता है।

सुनकर हैरानी होगी की अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने बोलने की समस्या के चलते स्कूल जाना बेहद बाद में शुरू किया। और जब जाना शुरू किया तो स्कूल बिल्कुल जेल की तरह लगता था। उन्हें लगता था कि  स्कूल में आधा अधूरा ज्ञान मिलता है। जब वे अध्यापकों से विभिन्न और कुछ हटकर प्रश्न पूछते थे तो अध्यापक उन्हें मंदबुद्धि कहते थे। बार-बार अपने लिए मंदबुद्धि सुनकर उन्हें लगने लगा कि उनके दिमाग का विकास अभी पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। इसी प्रश्न का उत्तर जानन वे अपने अध्यापक के पास गए तो उनसे टीचर ने कहा कि अभ्यास ही सफलता का मूल मंत्र है। ये बात उन्होंने अपने मन में बैठा ली और प्रण लिया कि एक दिन सबसे आगे बढ़कर दिखाऊंगा।
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उनका मन पढ़ने में नहीं लगता था फिर भी वो पूरे टाइम अपने हाथों में किताब लिए बैठे रहते थे। कुछ समय बाद इस चीज का सकारात्मक परिणाम सबको दिखाई देने लगा। इस विकास को देखकर उनके अध्यापक भी दंग रह गए। आगे चलकर उन्होंने गणित जैसे जटिल विषय को चुना। चूंकि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए उनकी पढ़ाई में काफी बाधा आई।अपने कठिन परीश्रम और मेहनत से अल्बर्ट ने गणित और भौतिक विज्ञान में महारथ हासिल कर ली। शिक्षा को लेकर उनका विचार था कि शिक्षा वो है जो आपको तब भी याद रहे जब आप सब कुछ भूल जाओ।
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