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अपनी मेहनत और शिक्षा से आदिवासियों को दी एक नई पहचान, जानें कैसे किया नामुमकिन को मुमकिन

Tue, 27 Nov 2018 10:55 AM IST
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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नागेंद्र प्रताप सिंह
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नागेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पांच साल पहले हुए दंगों को उत्तर प्रदेश का प्रशासन कैसे भूल सकता है! इसे दंगे से न सिर्फ मुजफ्फरनगर प्रभावित हुआ था, बल्कि आस-पास के दूसरे जिलों पर भी हिंसा के छींटें पड़े थे। 2014 में मुझे शामली का जिलाधिकारी बनाकर भेजा गया था। जिले में दंगा पीड़ितों के लिए शिविर बनाए गए थे। मैंने वहां का दौरा किया, तो उस शिविर के निकटवर्ती गांवों में भी जाने का मौका मिला। करीब एक दर्जन गांवों का दौरा करने के बाद मैं एक ऐसे गांव में पहुंचा, जहां अधिकांश घरों के दरवाजों पर ताले लटक रहे थे। मैंने पता लगाया, तो मालूम हुआ कि यह बावरियों का गांव है।
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हालांकि इस जनजाति के बारे में मैं बिल्कुल भी अनजान नहीं था, लेकिन उस दिन मेरे भीतर उनके बारे में और ज्यादा जानने की जिज्ञासा पैदा हुई। ग्राम प्रधान से मिलकर मैंने इनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की। मुझे पता चला कि इस समुदाय की सामाजिक हालत बहुत दयनीय है। मुझे बताया गया कि इस समुदाय के अधिकतर बच्चे पढ़ते नहीं है। युवाओं समेत महिलाएं शराब के अवैध धंधों में लिप्त रहती हैं। मुझे उनकी स्थिति नागवार गुजरी। जिले का जिम्मेदार होने के नाते मेरा दायित्व भी था कि मुख्यधारा से कटी इस जनजाति को विकास और आधुनिकता से जोड़ा जाए। लेकिन यह सोचना जितना आसान था, उसे कर पाना दरअसल उससे कहीं ज्यादा मुश्किल काम था। सबसे पहले मैंने इस समुदाय का भरोसा जीतना चाहा।

उनके बीच सीधे कोई फरमान पहुंचाने के बजाय मैंने विभिन्न खेलों की गतिविधियां आयोजित कराईं। खेलों का असर पड़ा। जो युवा शराब के नशे में धुत्त रहते थे, वे खेलों के जरिये दूसरों से घुलने-मिलने लगे। कुछेक ने पढ़ने की भी इच्छा जाहिर की। यह विडंबना ही थी कि विद्यार्थी न होने के कारण उस गांव का स्कूल भी बंद हो चुका था। लेकिन जब शिक्षा की चिंगारी दोबारा पैदा हुई, तो स्कूल चालू करवाया गया। मुझे पता था कि इतने से काम चलने वाला नहीं है। सो मेरा अगला लक्ष्य इस समुदाय की महिलाओं को शराब के कारोबार से निकालकर ढंग के काम से जोड़ना था। मैंने पहल करके एक आम सभा बुलाई, जिसमें आसपास के कई गांवों की महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई। इसी सभा में दर्जन भर महिलाओं ने शराब के काम से तौबा कर ली। मेरा दायित्व था कि सही रास्ते पर लौटने वाली इन महिलाओं की जीविका के लिए कोई दूसरा जरिया मुहैया कराया जाए। मैंने इनके लिए समूह का निर्माण करने में मदद की और इन्हें कई दूसरे तरह के कामों का प्रशिक्षण दिलाने की व्यवस्था की।
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हाईस्कूल में अच्छे अंक लाने के बावजूद एक बावरिया छात्रा अपने पिता की मौत के बाद आगे पढ़ाई कर पाने में सक्षम नहीं थी। मैंने उसका दाखिला दिल्ली के एक अच्छे स्कूल में करा दिया। इंटर में उसने और अच्छे अंक अर्जित किए, जिस कारण आज वह मिरांडा हाउस से बीएससी कर रही है। उसका सपना है कि वह आईपीएस अधिकारी बनकर अपने समाज के लिए कुछ कर सके। विभिन्न जिलों में मेरी पोस्टिंग होती रहती है। मैं कोशिश करता हूं कि संबंधित जिले में काम करने वाली कंपनियां अपना सामाजिक दायित्व निभाती रहें। मैंने कई कंपनियों को इस मद के पैसे का बेहतर नियोजन करने की सलाह दी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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