फिल्म से मिली प्रेरणा
यह विचार हाल ही में आई मलयालम फिल्म 'स्थानार्थी श्रीकुट्टन' से प्रेरित है, जिसमें एक कक्षा 7 का छात्र पीछे बैठने पर उपहास का सामना करता है और फिर नई व्यवस्था का सुझाव देता है।
फिल्म के निर्देशक विनेश विश्वनाथन ने बताया, "यह विचार हमारा नहीं है, बल्कि पहले भी 'जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)' के तहत ऐसा मॉडल इस्तेमाल होता था, जिसे हमने समय के साथ खो दिया। फिल्म के जरिए यह फिर सामने आया।"
उन्होंने यह भी बताया कि पंजाब के एक स्कूल ने भी यह व्यवस्था अपनाई है। वहां के प्रिंसिपल ने फिल्म को ओटीटी पर देखकर न केवल इसे देखा, बल्कि छात्रों को भी दिखाया और क्लासरूम में यह बदलाव किया।
मंत्री का भी मिला समर्थन
इस नवाचार को केरल के मंत्री के. बी. गणेश कुमार का भी समर्थन मिला है, जिनके परिवार द्वारा यह स्कूल संचालित होता है। उन्होंने फिल्म रिलीज से पहले ही इसे देखा और स्कूल के शिक्षकों के साथ विचार-विमर्श कर एक प्राइमरी कक्षा में इसे लागू किया। परिणाम उत्साहजनक रहे, जिससे यह व्यवस्था अब स्कूल की सभी कक्षाओं में अपनाई जा चुकी है।
बैक बैंचर जैसी धारणा को तोड़ती है ये व्यवस्था
स्कूल के प्रधानाध्यापक सुनील पी. शेखर ने कहा कि यह व्यवस्था हर छात्र को समान रूप से ध्यान देने में मदद करती है और ‘बैक बेंचर’ जैसी धारणा को तोड़ती है। वहीं, 30 वर्षों से पढ़ा रहीं शिक्षिका मीरा मैडम ने बताया, "अब मैं हर छात्र से जुड़ पाती हूं। सभी बच्चों को एक-दूसरे का चेहरा भी दिखता है और वे शिक्षक की बातों पर भी पूरा ध्यान देते हैं।"
सोशल मीडिया पर हो रही खूब चर्चा
यह मॉडल केरल के कम से कम आठ अन्य स्कूलों में फैल चुका है और देश के अन्य हिस्सों के शिक्षक भी इसे लेकर रुचि दिखा रहे हैं। हालांकि, कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर भीड़भाड़ वाली कक्षाओं में इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं, लेकिन निर्देशक विश्वनाथन ने कहा कि भीड़भाड़ खुद स्कूल के नियमों का उल्लंघन है और इस पर अब अधिकारी ध्यान दे रहे हैं।
इस पहल को उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी सराहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे "स्वागत योग्य कदम" बताया, भले ही उन्होंने खुद को 'बैकबेंचर' कहलवाना पसंद किया हो।