प्रवासी मजदूर से डॉक्टर बनने तक का सफर
अनुसूचित जनजाति वर्ग में उनकी रैंक 18,212 थी और उन्हें यहां एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में दाखिला मिला।
सबर ने पीटीआई-भाषा को बताया, "हाल ही में, बेंगलुरु में एक निर्माण स्थल पर काम करते समय, मेरे शिक्षक का फोन आया और उन्होंने मुझे मिठाई बाँटने के लिए कहा। मैं हैरान रह गया और उनसे कारण पूछा। उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे बताया कि मैंने नीट परीक्षा पास कर ली है। यह मेरे लिए एक सपने के सच होने जैसा था। मैं अपने आँसू नहीं रोक सका और अगले दिन उस ठेकेदार की अनुमति से घर लौट आया जिसने मुझे इस काम पर लगाया था।"
अपने तीन महीने के काम के दौरान, छात्र ने 45,000 रुपये कमाए, जिसमें से वह 25,000 रुपये बचा सका।
पुलिस अधिकारी बनना चाहते थे सबर
प्रवासी श्रमिक के रूप में बेंगलुरु तक की यात्रा का कारण पूछे जाने पर सबर ने कहा कि "मेरे पास अपने परिवार का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।"
उन्होंने कहा, "मैं पांच सदस्यों वाले एक बेहद गरीब परिवार से हूं। जैसे ही नीट परीक्षा खत्म हुई, मैंने अपने परिवार की मदद के लिए कुछ पैसे कमाने का फैसला किया। मैंने एक स्थानीय ठेकेदार से संपर्क किया जिसने मुझे बेंगलुरु भेज दिया। मेरी बचत से मुझे मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया,"
सबर ने यह भी बताया कि वह शुरू में पुलिस अधिकारी बनना चाहते थे, लेकिन जब उन्होंने उच्च शिक्षा की तैयारी शुरू की तो उनके मन में डॉक्टर बनने की इच्छा जागी।
ओडिशा के लोगों की सेवा करेंगे
मेडिकल छात्र ने कहा, "मैं अब डॉक्टर बनने और ओडिशा के लोगों की सेवा करने के अपने सपने को पूरा करने की राह पर हूं।"
उनके माता-पिता - सहदेव और रंगी - को उम्मीद थी कि सरकार उन्हें वित्तीय सहायता देगी ताकि वह अपना पांच वर्षीय एमबीबीएस कोर्स पूरा कर सकें।
शुभम की मां रंगी ने कहा, "बचपन से ही वह बहुत मेहनती और मेधावी रहा है। वह डॉक्टर बनना चाहता था। उसकी कड़ी मेहनत ने उसे सफलता दिलाई।"
उसकी खुश मां ने कहा, "शुभम अपने माता-पिता और भाई-बहनों को दिन-रात कड़ी मेहनत करते देखकर बड़ा हुआ। उसने कड़ी मेहनत करना सीखा और सफल हुआ,"