आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बर्खास्त किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर उच्च न्यायालय ने मंगलवार को दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही, सरकार के सक्षम अधिकारियों को बर्खास्तगी के ऐसे आदेश पारित नहीं करने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव ने दिल्ली राज्य आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका संघ की ओर से दाखिल याचिका पर विचार करते हुए यह आदेश दिया है। उन्होंने सरकार को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। इसके साथ ही न्यायालय ने सरकार को और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बर्खास्त नहीं करने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने न्यायालय से बर्खास्त आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अंतरिम राहत देने और काम पर आने की अनुमति देने का आग्रह किया गया।
इस पर सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले में सहानुभूति दृष्टिकोण रखने का समर्थन किया और कहा कि हम (सरकार) देखेंगे कि क्या किया जा सकता है। उन्होंने न्यायालय को बताया कि 991 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बर्खास्तगी नोटिस जारी किया गया है।
याचिकाकर्ताओं को बहाली के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत उनके लिए उपलब्ध वैकल्पिक उपाय का लाभ उठाना चाहिए। सरकार के वकील ने मौखिक रूप से आश्वासन दिया कि इस मामले के लंबित होने के मद्देनजर कोई और बर्खास्तगी का आदेश जारी नहीं किया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता किसी भी सरकारी पद पर आसीन नहीं थीं। उन्हें केवल मानदेय दिया गया था और पिछले महीने उनके भत्ते में वृद्धि की गई थी। 3000 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं में से अधिकांश ने नोटिस जारी होने के बाद काम पर आने का फैसला किया, लेकिन कुछ अभी भी काम पर नहीं रही हैं।
याचिकाकर्ता संघ की ओर से अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने महामारी के दौरान फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में काम किया और बर्खास्त किए गए कर्मचारियों की संख्या लगभग 2000 है। दायर याचिका में कहा गया है कि 31 जनवरी और 9 मार्च को कई आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने अधिकारियों को हड़ताल की सूचना देने के बाद शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन जब सरकार ने निषेध आदेश जारी किया तब इसे समाप्त कर दिया गया।