भारतीय ज्ञान परंपरा को शैक्षणिक मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता
-जेएनयू कुलगुरु शांतिश्री डी पंडित ने सम्मेलन को किया संबोधित
-अगले वर्ष बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में होगा सम्मेलन का आयोजन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित तीन दिवसीय शैक्षणिक सम्मेलन का शनिवार को समापन हो गया। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनरुत्थान : जो पाया है उसे जानना, जो सीखा है उसे सीखना विषय पर पहली बार हुए सम्मेलन में 80 पेपर प्रस्तुत किए गए। अगली बार बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में सम्मेलन का आयोजन होगा।
सम्मेलन के समापन के मौके पर जेएनयू कुलगुरु प्रो. शांतिश्री डी. पंडित ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल एक पूरक विषय नहीं बल्कि शैक्षणिक मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। इसकी गंभीरता तभी साकार होगी जब हम पाठ्यक्रम, संसाधन और शिक्षक-प्रशिक्षण में ठोस निवेश करें। हमें एक ऐसा मंच चाहिए जो मौखिक और जनजातीय ज्ञान को स्टेम और सामाजिक विज्ञानों के साथ जोड़ सकें। साथ ही परंपरा को आधुनिकता से, निरंतरता को परिवर्तन से, मिथक को यथार्थ से और ज्ञान के क्षेत्र को भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा विरासत संगठन के निदेशक प्रो. एमएस चेत्रा ने कहा, भारतीय ज्ञान प्रणालियां न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही हैं। सम्मेलन जेएनयू की ओर से भारतीय ज्ञान परंपरा विरासत संगठन के सहयोग से आयोजित किया गया था। जिसमें 17 से अधिक शैक्षणिक सत्रों, परिसंवादों और मुख्य व्याख्यानों का आयोजन किया गया। इन सत्रों की अध्यक्षता देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने की। सम्मेलन के मुख्य वक्ताओं में प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रो. मंजुल भार्गव और भाषाविद् प्रो. कपिल कपूर, जनार्दन देव गोस्वामी, पीतांबर देव गोस्वामी, प्रो. सचिन चतुर्वेदी सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।