टीबी (क्षय रोग) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा इथाम्बुटोल से आंखों की नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है, लेकिन अब इस समस्या को शुरुआती दौर में ही पकड़ने का एक आसान तरीका सामने आया है।
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने एक नए शोध में पाया है कि ऑटोमेटेड प्यूपिलोमेट्री नामक जांच से आंखों में होने वाले सूक्ष्म बदलावों का समय रहते पता लगाया जा सकता है। यह अध्ययन ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस रिसर्च में 62 नए टीबी मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें फेफड़ों या शरीर के अन्य हिस्सों की टीबी थी।
शोध के अनुसार, इन मरीजों को पहली बार एंटी-टीबी दवाएं दी गईं, जिनमें इथाम्बुटोल भी शामिल था। डॉक्टरों ने इलाज शुरू होने से पहले 3 महीने और फिर 6 महीने बाद मरीजों की आंखों की जांच की। इसके लिए ऑटोमेटेड प्यूपिलोमेट्री के साथ-साथ ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (ओसीटी) और विजुअल इवोक्ड पोटेंशियल (वीईपी) जैसे टेस्ट किए गए।
अध्ययन के नतीजों में पाया गया कि 6 महीने बाद मरीजों की आंख की पुतली की प्रतिक्रिया में बदलाव आने लगे। पुतली के सिकुड़ने की मात्रा कम हुई और उसके फैलने की गति भी धीमी पाई गई। इसके साथ ही रेटिनल नर्व फाइबर लेयर (आरएनएफएल) कही जाने वाली आंख की नसों की परत की मोटाई में भी कमी देखी गई। खासकर ऊपरी, किनारे और निचले हिस्सों में। वीईपी टेस्ट में भी देरी बढ़ी, जो आंखों की नसों पर असर का संकेत है। हालांकि, राहत की बात यह रही कि किसी भी मरीज में आंखों से जुड़ी कोई स्पष्ट समस्या या शिकायत नजर नहीं आई।
शोध टीम की प्रमुख डॉ. परोमिता दत्ता के अनुसार, आंख की नसों के किनारे वाले हिस्से में आए बदलावों का सीधा संबंध प्यूपिलोमेट्री में दिखे बदलावों से है। उन्होंने बताया कि ऑटोमेटेड प्यूपिलोमेट्री एक सस्ती, आसान और तेज जांच है, जिसे पोर्टेबल मशीन से भी किया जा सकता है। इसकी तुलना में ओसीटी और वीईपी जैसे टेस्ट महंगे हैं और हर जगह उपलब्ध नहीं होते, खासकर ग्रामीण इलाकों में।