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व्यवस्था बेपरवाह: गोविंदपुरी डबल मर्डर के बाद थानों के रिस्पॉन्स सिस्टम की पड़ताल, सामने आईं गंभीर खामियां

Tue, 26 May 2026 05:31 AM IST
Digvijay Singh ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के गोविंदपुरी डबल मर्डर मामले ने राजधानी की पुलिस प्रतिक्रिया व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।  मृतकों के परिजनों का दावा है कि घटना की रात उन्होंने कई बार पुलिस थाने में फोन किया, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई।
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सिस्टम की पड़ताल में सामने आईं गंभीर खामियां - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कल्पना कीजिए, संकट की घड़ी में आपकी आखिरी उम्मीद पुलिस हो और मदद के लिए किया गया फोन ही जवाब न दे...। दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के गोविंदपुरी डबल मर्डर मामले ने राजधानी की पुलिस प्रतिक्रिया व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतकों के परिजनों का दावा है कि घटना की रात उन्होंने कई बार पुलिस थाने में फोन किया, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई। आखिरकार उन्हें खुद थाने जाकर सूचना देनी पड़ी। यह मामला केवल एक परिवार की शिकायत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल का कारण बना, जिस पर करोड़ों लोग अपनी सुरक्षा के लिए निर्भर हैं। इसी दावे की जांच के लिए राजधानी के अलग-अलग इलाकों के आठ पुलिस थानों के लैंडलाइन नंबर और संबंधित एसएचओ से संपर्क करने की कोशिश की गई। परिणाम कई जगह चिंताजनक मिले। 

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दिल्ली पुलिस 112 व 100 नंबर पर कॉल करने को लेकर सोशल मीडिया व अन्य तरीकों से जनता को जागरूक कर रही है। इसके लिए अभियान चलाया जा रहा है। -राजीव कुमार, प्रवक्ता व अतिरिक्त पुलिस आयुक्त दिल्ली पुलिस

कहीं फोन नहीं, कहीं बजती रही घंटी
 मालवीय नगर थाने में दो कॉल किए गए दोनों रिसीव हुईं।
 साकेत थाने में एसएचओ का नंबर व्यस्त मिला, जबकि लैंडलाइन पर संपर्क नहीं हो पाया।
 डिफेंस कॉलोनी थाने में एसएचओ ने फोन रिसीव नहीं किया और लैंडलाइन का संपर्क अस्थायी रूप से बंद आया।
 जैतपुर थाने में भी यही स्थिति देखने को मिली, एसएचओ तो उपलब्ध, लेकिन लैंडलाइन फोन नहीं।
 राजौरी गार्डन थाने में एसएचओ ने कोई जवाब नहीं दिया और नंबर संपर्क क्षेत्र से बाहर बताता रहा।
 न्यू उस्मानपुर थाने में एसएचओ ने फोन उठाया, लेकिन लैंडलाइन नंबर अमान्य।
गांधी नगर थाने में एसएचओ ने फोन उठाया, लेकिन लैंडलाइन नंबर उपयोग में नहीं।
 फर्श बाजार थाने में एसएचओ ने कॉल रिसीव नहीं की और लैंडलाइन आउट ऑफ ऑर्डर रही।
यह तस्वीर कई सवाल छोड़ती है। डिजिटल पुलिसिंग, पीसीआर नेटवर्क, सीसीटीवी निगरानी और तकनीकी सुधारों के दावों के बीच यदि नागरिक सीधे थानों तक नहीं पहुंच पा रहे, तो जमीनी स्तर पर व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
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जनता कहां जाए
दिल्ली पुलिस की बेवसाइट में थानों के जो नंबर दे रखे हैं वह काम नहीं कर रहे हैं। थानाध्यक्ष फोन उठाते नहीं है। ऐसे में जनता क्या करे। 100 या 112 नंबर पर फोन करने को लेकर जनता में जागरूकता नहीं है। कई बार इन आपातकालीन नंबर पर समय से संपर्क नहीं हो पाता। लाइनें व्यस्त रहती हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट में पीसीआर रिस्पॉन्स पर सवाल (2016)
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान खुद पुलिस ने माना था कि कई बार 100 नंबर पर कॉल का जवाब देर से मिलता है। अदालत में बताया गया कि कुछ मामलों में पुलिस को मौके पर पहुंचने में 37 मिनट तक लग गए।

आरोप लगते रहे...पर व्यवस्था नहीं सुधरी

दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामला (निर्भया मामला, 2012)
पीड़िता के दोस्त ने आरोप लगाया था कि घटना के बाद पुलिस समय पर नहीं पहुंची और मदद मिलने में देरी हुई। बाद में इस मुद्दे पर दिल्ली पुलिस को सफाई भी देनी पड़ी।

सोते हुए 62 वर्षीय बुजुर्ग की गोली मारकर हत्या
2021 में द्वारका के पालम एक्सटेंशन में बाहर सोते एक 62 वर्षीय बुजुर्ग अजीत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले में परिजनों ने आरोप लगाया था कि पुलिस को सूचना देने के बाद भी मौके पर पहुंचने में काफी समय लगा। स्थानीय लोगों ने उस समय पुलिस पेट्रोलिंग पर भी सवाल उठाए थे।

कंझावला केस साल 2023
दिल्ली के कंझावला में अंजलि की मौत 31 दिसंबर और 1 जनवरी की रात को हुई थी। इस मामले में अंजलि के शव को दिल्ली की सड़कों पर 12 किलोमीटर तक घसीटा गया था। 1 जनवरी की तड़के एक राहगीर ने कार के पीछे लाश घिसटती देखी थी। इसके बाद सवाल उठा कि पीसीआर और स्थानीय पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी थी। शुरुआती सूचना तंत्र पर गंभीर सवाल उठे थे।

2020 का दिल्ली दंगा
2020 के दिल्ली दंगे के दौरान कई इलाकों से लोगों ने आरोप लगाए कि बार-बार कॉल करने के बावजूद पुलिस समय पर नहीं पहुंची। कई पीड़ितों ने अदालतों और फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट्स में भी यह बात रखी थी।

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