जेएनयू कैंपस में कुलपति प्रो. शांतिश्री डी पंडित से मुलाकात के बाद सरिता ने सफलता के लिए परिवार के साथ विश्वविद्यालय को श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि जेएनयू के शानदार अकादमिक जगत, शिक्षकों और प्रगतिशील छात्र राजनीति ने मुझे इस देश को सही अर्थों में समझने और समाज को देखने की नई दृष्टि दी। इस विश्वविद्यालय ने मुझे सबसे पहले इंसान बनाया।
मुंबई के ट्रैफिक सिग्नल पर फूल बेचने से लेकर जेएनयू और फिर अमेरिका में उच्च शिक्षा का सपना पूरा होने की मूलरूप से यूपी के जौनपुर निवासी सरिता माली की कहानी हम सबके लिए एक उम्मीद जगाती है। मुश्किल हालात के बाद भी परिस्थितियों और किस्मत को कोसने के बजाय यदि कुछ बनने का जुनून हो तो कोई भी राह मुश्किल नहीं होती है। सरिता माली की सफलता के चलते ही बृहस्पतिवार को जेएनयू की कुलपति प्रो. शांतिश्री डी पंडित ने मुलाकात कर बधाई दी। वह हिंदी साहित्य में पीएचडी करने कैलिफोर्निया जाएंगी।
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कुलपति ने कहा कि जेएनयू ऐसा विश्वविद्यालय है, जो ऐसे होनहार छात्रों को आगे बढ़ने का मौका देता है। सरिता हम सब समेत उन छात्रों के लिए मिसाल है। जेएनयू कैंपस में कुलपति प्रो. शांतिश्री डी पंडित से मुलाकात के बाद सरिता ने सफलता के लिए परिवार के साथ विश्वविद्यालय को श्रेय दिया।
उन्होंने कहा कि जेएनयू के शानदार अकादमिक जगत, शिक्षकों और प्रगतिशील छात्र राजनीति ने मुझे इस देश को सही अर्थों में समझने और समाज को देखने की नई दृष्टि दी। इस विश्वविद्यालय ने मुझे सबसे पहले इंसान बनाया। वह इंसान बनाया, जो समाज में व्याप्त हर तरह के शोषण के खिलाफ बोल सके। मैं बेहद उत्साहित हूं कि जेएनयू ने अब तक जो कुछ सिखाया उसे आगे अपने शोध के माध्यम से पूरे विश्व को देने का एक मौका मुझे मिला है। सरिता कहती हैं कि महज 20 साल की उम्र में वर्ष 2014 में जब जेएनयू में अपनी मॉस्टर्स की पढ़ाई के लिए आई तो दुनिया से लेकर समाज की समझ नहीं थी। एमए, एमफिल की डिग्री के बाद अब पीएचडी जमा करने के बाद मुझे अमेरिका में दोबारा पीएचडी की पढ़ाई का मौका मिला।
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सरिता माली के फेसबुक पोस्ट का अंश
फेसबुक पोस्ट में माली ने अपने संघर्षों की दास्तां शेयर की है। उन्होंने लिखा कि अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों में मेरा चयन हुआ है- यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन... मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया को वरीयता दी है। मुझे इस यूनिवर्सिटी ने मेरिट और अकादमिक रिकॉर्ड के आधार पर अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित फेलोशिप में से एक ‘चांसलर फ़ेलोशिप’ दी है। मैं मूल रूप से यूपी के जौनपुर से हूं, लेकिन मेरा जन्म और परवरिश मुंबई में हुई। मैं भारत के जिस वंचित समाज से आई हूं, वह देश के करोड़ों लोगों की नियति है। आज यह एक सफल कहानी इसलिए बन पाई है क्योंकि मैं यहां तक पहुंची हूं। जब आप किसी अंधकारमय समाज में पैदा होते हैं तो उम्मीद की वह मध्यम रोशनी जो दूर से रह -रहकर आपके जीवन में टिमटिमाती रहती है, वही आपका सहारा बनती है। मैं भी उसी टिमटिमाती हुई शिक्षा रूपी रोशनी के पीछे चल पड़ी। मेरी उम्मीद थे मेरे माता-पिता और मेरी पढ़ाई।
पिता की हिम्मत से आज यहां पहुंची
मैं आज जहां हूं, उसका श्रेय मेरे पिताजी को जाता है। परिवार के साथ मुंबई में झुग्गी में रहा करती थी। उन्होंने हमेशा पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। मैं जब छठीं में पढ़ती थी, तब पिता के साथ मुंबई के ट्रैफिक सिग्नल पर फूल बेचने के लिए गाड़ियों के पीछे दौड़ना पड़ता था। फूल बिकते तो परिवार दिनभर में मुश्किल से 300 रुपए कमा पाता था। दसवीं के बाद ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। मैं पिता की खूब पढ़ने की इच्छा पूरी करना चाहती थीं। पैसे बचाकर उन्होंने केजे सोमैया कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स में दाखिला लिया।