पूरी दुनिया आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मना रही है। एक तरफ ऐसी महिलाएं जो अब भी अन्य वर्गों के मुकाबले कमजोर हैं, उन्हें यह दिन समर्पित करते हुए दुनिया सशक्तिरण की ओर बढ़ने में मदद कर रही है, वहीं दूसरी ओर जो नारियां मजबूत और सशक्त हो चुकी हैं देश उनकी सराहना करते नहीं थक रहा है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं राजस्थान के छोटे से गांव से निकलकर दिल्ली की चकाचौंध में खुद को स्थापित करने के बाद अब समाज के कमजोर वर्ग के सशक्तिकरण में जुटीं सलोनी मित्तल के बारे में।
पीलीबगान जैसा गांव जहां लड़कियों के लिए पढ़लिखकर अपना करियर बनाना ही बड़ी बात है, वहां सलोनी ने पढ़ाई से अलग हटकर फाइन आर्ट्स की फील्ड में अपना करियर बनाने की ठानी। यह क्षेत्र ही उस समय चुनौतिपूर्ण चुनाव था, लेकिन सलोनी अपने हाथों का जादू बिखेरती गईं और अपनी कला के बदौलत फाइन आर्ट्स का व्यवसाय शुरू किया।
बचपन से ही समाज सेवा में अग्रणी रहने वाली सलोनी एक ओर जहां खुद को स्थापित करने में जी-जान से जुटी रहीं, वहीं समाज की सहायता करने का शौक कभी नहीं मरा। उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों में भी जरूरतमंदों की सेवा जारी रखी। यही कारण है कि दिल्ली की कई झुग्गियों के बच्चे आज उन्हें 'दीदी' कहकर पुकारते हैं और हर रविवार उनका इंतजार करते हैं।
वर्तमान में दिल्ली में फाइन आर्ट्स का व्यवसाय कर रही सलोनी महज 23 साल की हैं। उनकी कमाई का एक निर्धारित हिस्सा जरूरतमंद बच्चों का खर्च वहन करने में जाता है, ताकि सुविधाओं की कमी के कारण वे पीछे न रह जाएं। सलोनी हर रविवार को झुग्गियों में जाकर बच्चों के बीच पढ़ाई-लिखाई और खान-पान की सामग्रियां वितरित करती हैं।
इसके साथ ही पढ़ाई में मेधावी कई छात्रों के स्कूल का पूरा खर्च वह खुद वहन करती हैं। सलोनी कहती हैं कि इस तरह के योगदान देकर वह समाज के सशक्तिकरण में अपनी यथासंभव भूमिका निभाते रहना चाहती हैं।