दिल्ली तैयार कर रही प्रदूषण से लड़ने का मॉडल
नई दिल्ली। दिल्ली की आबोहवा बीते एक दशक में बेशक बेहतर होने की राह पर है, लेकिन देश में प्रदूषित शहरों संख्या बढ़ती जा रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि एक दशक में देश के किसी शहर की आबोहवा मानक से 50 फीसदी नीचे तक साफ नहीं रही। 2018 में सिर्फ तीन फीसदी शहरों में धूल के महीन कणों का स्तर मानक से कम है, जबकि 2007 में 13 फीसदी शहर इस मानक से नीचे थे।
सीपीसीबी की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद सेंटर ऑफ साइंस एंड एनवायरमेंट की सलाह है कि प्रदूषण से लड़ने का दिल्ली मॉडल पूरे देश के लिए बेहतर हो सकता है। हालात खराब रहने के बाद भी दिल्ली में 2011-2019 के बीच वायु प्रदूषण का स्तर 25 फीसदी गिरा है। 2007 में देश के 60 फीसदी शहरों में पीएम 10 नाजुक स्तर पर था। 2008 में ऐसे शहरों की संख्या 75 फीसदी पहुंच गई है।
सीएसई की कार्यकारी महानिदेशक अनुमिता राय चौधरी बताती हैं कि आज जब नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के तहत देश के 122 शहर अपनी योजना तैयार करने के साथ लागू करने की प्रक्रिया में हैं, तब दिल्ली मॉडल का अनुभव बेहतर साबित हो सकता है। इससे पता चलता है कि प्रदूषण से लड़ने की चुनौती कितनी बड़ी है। एक दशक में तमाम कोशिशों के बावजूद आबोहवा सिर्फ 25 फीसदी साफ हुई है। 65 फीसदी पर काम करना बाकी है। इस लिहाज से दिल्ली मॉडल देश के दूसरे शहरों के लिए नजीर बन सकता है।
दिल्ली ने सबसे पहले लागू किया ग्रैप
फिलहाल 122 शहर एनसीएपी के तहत अपनी योजना तैयार कर रहे हैं। इसमें से कुछ की योजना मंजूर भी कर ली गई है। दिल्ली देश का सबसे पहला शहर है, जहां योजना लागू की गई। इसके तहत सख्ती से कदम उठाए गए, जिसका असर अब दिखने लगा है। आगे भी इस दिशा में संजीदगी से काम करने की जरूरत है।
प्रदूषण से लड़ने का दिल्ली मॉडल
वाहन के क्षेत्र में :
-दिल्ली-एनसीआर में सीएजी से चल रहे वाहन।
-पेट्रोल-डीजल बीएस-4 का स्तर का। 2020 तक यह होगा बीएस-5 स्तर का।
-अल्ट्रो लो सल्फर ईंधन का इस्तेमाल।
-10 साल पुराने व डीजल से चलने वाले ट्रकों पर पाबंदी। साथ ही, ट्रकों को देना पड़ता एनवायरमेंट कंपनसेशन चार्ज।
-बड़ी डीजल कार व एसयूवी से लिया जाता एनवायरमेंटल पॉल्यूशन चार्ज।
-10 साल पुरानी डीजल कार की पाबंदी।
उद्योग व ऊर्जा क्षेत्र :
-सभी ताप विद्युत संयंत्रों को बंद किया गया।
-पेट कोक, फर्नस ऑयल व कोयला जैसे खराब ईंधन के इस्तेमाल की सभी क्षेत्रों में इस्तेमाल की पाबंदी।
-एनसीआर क्षेत्र के करीब 400 ईंट भट्ठों से होने वाले प्रदूषण का स्तर घटाने के लिए जिगजैग तकनीक का इस्तेमाल।
-कई उद्योगों में नेचुरल गैस का ईंधन के तौर पर हो रहा इस्तेमाल।
धुआं व धूल के कणों पर रोक :
-कचरे को जलाने पर पाबंदी।
-निर्माण स्थलों पर निगरानी।
-सड़कों की यांत्रिक तरीके से सफाई।
-वन क्षेत्र का विस्तार।
-धूल भरे स्थलों पर पानी का छिड़काव।
नोट : इस क्षेत्र में सख्त पाबंदी की अभी भी जरूरत।