नई दिल्ली। अदालत ने लिंग जांच रैकेट मामले की जांच घोंघे की गति से करने पर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा इन सामंती प्रथाओं की किसी भी कीमत पर अनुमति नहीं दी जा सकती है। अदालत ने कहा ऐसे समय में जब सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाएं चला रही है, इस तरह की नापाक गतिविधियों में शामिल सभी लोगों को एक कड़ा संदेश की जरूरत है कि इसकी किसी भी कीमत पर अनुमति नहीं दी जा सकती है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समर विशाल ने इस मामले में तीन आरोपियों को अग्रिम जमानत प्रदान करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने अपराध शाखा के डीसीपी को अपने स्तर पर जांच की निगरानी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि जांच में सुधर नहीं हुआ तो पुलिस आयुक्त के संज्ञान में यह मामला लाया जाएगा।
अदालत ने आरोपियों की जमानत पर आपत्ति जताने संबंधी पुलिस की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा मामले में प्राथमिकी अक्तूबर 2019 में दर्ज की गई लेकिन जांच में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने कहा अपराध की गंभीरता को समझने के बावजूद जांच घोंघे की गति से और बिना किसी गंभीरता के चल रही है। उन्होंने कहा ऐसे अपराध करने वाले समाज के लिए खतरा हैं। एक सभ्य समाज में ऐसे अपराधों के लिए कोई जगह नहीं है।
यह मामला स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से दिल्ली पुलिस को दी गई एक शिकायत के बाद सामने आया। इसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी व्यक्ति अपनी कंपनी के माध्यम से उन जोड़ों को सेवाएं प्रदान कर रहे हैं जो आईवीएफ के माध्यम से लड़की की अपेक्षा लड़का चाहते हैं।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी व्यक्ति आईवीएफ उपचार के क्षेत्र में रोगियों को परामर्श प्रदान करने की आड़ में लिंग चयन की सेवा प्रदान कर रहे हैं, जो भारत में प्रतिबंधित है।
अदालत ने कहा आरोपी कथित तौर पर इसके लिए पूरी कंपनी चला रहे हैं, जो अगर सच है तो बहुत शर्मनाक है। अदालत ने कहा पूरे देश में लड़कियों के अनुपात में गिरावट से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि इस देश में प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के इस्तेमाल से कन्या भ्रूण को खत्म करने की प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित है।