नई दिल्ली। गैंगरेप के फर्जी मामले में दो युवकों को फंसाने वाली युवती स्वयं कानून के शिकंजे में फंस गई। अदालत ने युवती के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई का निर्देश दिया। इसके साथ ही दोनों युवकों को आरोपमुक्त कर दिया। जांच अधिकारी को फटकार लगाते हुए पुलिस आयुक्त को ऐसे मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों को उचित ट्रेनिंग दिलवाने का निर्देश दिया है। द्वारका स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश विरेंद्र भट्ट ने कहा सभी तथ्यों, गवाहों व स्वयं पीड़िता के बयानों से स्पष्ट है कि उसने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गैंगरेप की फर्जी स्टोरी बनाई। तथ्यों से स्पष्ट है कि गैंगरेप या फिर रेप हुआ ही नहीं। एक अभियुक्त प्रीतम यादव को युवती पहले से जानती थी और उससे कई बार शारीरिक संबंध बना चुकी थी। युवती ने स्वयं माना है कि दूसरे अभियुक्त मनोज कुमार यादव को वह नहीं जानती थी। उसे पहली बार थाने में देखा। इतना ही नहीं पुलिस के कहने पर उसे गैंगरेप में मामले फंसा दिया। इसके अलावा साक्ष्यों से स्पष्ट है मनोज घटना वाली रात परिवार के साथ फिल्म देखने गया था। अदालत ने कहा प्रीतम से कई माह से युवती के संबंध थे और घटना वाली रात भी उनके बीच संबंध बने, मगर बाद में हुए झगड़े को उसने गैंगरेप में तब्दील कर दिया। अदालत ने कहा यह तथ्य भी सामने आया है वह युवती की समय-समय पर पैसों से सहायता भी करता रहा है। युवती ने कानून का दुरुपयोग किया है। कोर्ट ने युवती के खिलाफ अदालत में झूठी गवाही देने व फर्जी फंसाने के आरोप में मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है।
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क्या था मामला
कापसहेड़ा निवासी 19 वर्षीय युवती ने आरोप लगाया था कि वह अक्तूबर 2011 में प्रीतम की दुकान पर मोबाइल रिचार्ज करवाने गई व उससे किराए पर कोई कमरा दिलवाने का आग्रह किया। तीन नवंबर 2011 को अभियुक्त उसे रात में कमरा दिलाने के लिए एक फ्लैट में ले गया व उससे दुष्कर्म किया। इसके बाद उसके दोस्त मनोज ने भी कार में दुष्कर्म किया। किसी को कुछ बताने पर जान से मारने की धमकी देकर उसके घर के पास उतार कर फरार हो गए।