नई दिल्ली। ‘दहेज प्रताड़ना की धारा 498ए मानवाधिकार के हनन, जबरन वसूली और भ्रष्टाचार का रूप बन गई है। इसे कानूनी आतंकवाद के रूप में माना जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस धारा के दुरुपयोग को स्वीकार कर चुकी है। अदालत का कर्तव्य है कि इसके दुरुपयोग को रोक कर निर्दोष लोगों की रक्षा करे।’ दहेज प्रताड़ना के मामले में एक ही परिवार के सात लोगों को आरोपमुक्त करने संबंधी फैसले को उचित ठहराते हुए अदालत ने यह तल्ख टिप्पणी की।
रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. कामनी लॉ ने दहेज प्रताड़ना के सात आरोपियों को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा रिहा करने के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि धारा 498ए ससुराल पक्ष से बदला लेने, दहेज की वसूली या तलाक के लिए मजबूर करने का कानून नहीं है। इसका गलत इस्तेमाल करने वालों को दंडित करने का प्रावधान है। व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए इस कानून के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि अदालत की जिम्मेदारी है कि वह निर्दोष व्यक्तियों के उत्पीड़न को रोके। वैवाहिक विवाद मामलों में कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह देखे कि पति के अलावा उसके परिजनों की महिला के उत्पीड़न में कोई भूमिका है भी या नहीं। अदालत ने दहेज प्रताड़ना के मामले में इस बात पर आश्चर्य जताया कि महिला ने देवर की महिला मित्र को भी अभियुक्त बना दिया। अदालत ने सुल्तानपुरी निवासी पिंकी के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पति के अलावा ससुर उदय चंद, सास चंद्रावती, जेठ व देवर प्रेम कुमार, कमल कुमार, राहुल कुमार और ननद प्रवीन कुमारी के अलावा राहुल की महिला मित्र रुचिका को भी अभियुक्त बनाने का आग्रह किया था। न्यायाधीश कामनी लॉ ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने सभी तथ्यों को देखने के बाद ही इनको आरोेपमुक्त किया था। इस मामले में पति को निचली अदालत ने दोषी ठहराया हुआ है और अन्य सात को बरी कर दिया था।