संयंत्रों का ऑडिट नहीं
बैठक के दौरान एलजी के ध्यान में लाया गया कि सभी सीईटीपी अपनी क्षमता के केवल 68-70 प्रतिशत पर ही चल रहे थे, जबकि कई संयंत्रों को अपग्रेड किया जाना जरूरी है। यह भी बताया कि पिछले 10 वर्षों से संयंत्रों का कोई ऑडिट नहीं किया गया था। 40805 औद्योगिक इकाइयों और दूसरे प्रतिष्ठानों में से केवल 64 प्रतिशत (26077) ही सीईटीपी से जुड़े थे। 36 फीसदी यानी 23149 औद्योगिक इकाइयों से उपचार के बगैर ही प्रवाह को यमुना में प्रवाहित किया जा रहा है। एलजी ने इसे औद्योगिक संगठनों और सरकार की घोर लापरवाही के साथ-साथ आपराधिक बताया था।
यमुना में लगातार बढ़ता प्रदूषण चिंता का विषय
उन्होंने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि अभी भी 36 फीसदी औद्योगिक इकाइयां सीईटीपी से जुड़ी नहीं थीं, जबकि 33 प्रतिशत ने सदस्यता शुल्क का भी भुगतान नहीं किया। इससे यमुना में प्रदूषण बढ़कर असंतुलित हो गया। एलजी के निर्देश पर सभी पहलुओं का गहनता से मूल्यांकन करना जरूरी है। उपराज्यपाल ने मूल्यांकन का काम पूरा करने के लिए 30 दिन की समय सीमा तय की है।
उपराज्यपाल का निर्देश
बैठक में यह भी सामने आया कि कोई दूसरा विकल्प नहीं होने की वजह से उपचार के बाद सीईटीपी से नजफगढ़ नाले में ही पानी को छोड़ा जा रहा था। नतीजतन उपचारित प्रवाह दोबारा प्रदूषित हो रहा था। एलजी ने डीडीए, एमसीडी और दिल्ली जल बोर्ड को संबंधित जल निकायों की पहचान करने का निर्देश दिया था। इसके बाद नजफगढ़ नाले में प्रवाहित करने के बजाय उपचारित पानी को यमुना में प्रवेश करने की इजाजत देने के निर्देश दिए थे।
रखरखाव और संचालन के लिए राशि कम
सीईटीपी के प्रतिनिधियों ने एलजी के संज्ञान में लाया कि 2 नवंबर 2022 की अधिसूचना के मुताबिक उद्योग विभाग की तरफ से अलग-अलग श्रेणी के उद्योगों (लाल, नारंगी और सफेद) में वगीकृत किया गया। इसके लिए तय राशि को कम बताते हुए प्रतिनिधियों ने बताया कि इसके संचालन और रखरखाव की लागत अधिक है। एलजी ने सीईटीपी को आश्वासन दिया कि ऐसे सभी मामलों का उचित समाधान किया जाएगा। 30 दिन के अंदर मूल्यांकन होने के बाद इस पर निर्णय लिया जाएगा।