उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय विमानन कंपनी एयर इंडिया के बर्खास्त पायलटों को भारी राहत प्रदान करते हुए बहाल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने एयर इंडिया को सभी के बकाया वेतन व अन्य भत्तों का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है। इन पायलटों ने पहले त्यागपत्र दे दिया था, लेकिन बाद में उसे वापस लेने का आग्रह किया था।
न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने स्पष्ट किया कि अनुबंधित पायलटों के अनुबंध का विस्तार भविष्य में उनके संतोषजनक प्रदर्शन को देखते हुए एयर इंडिया के विवेक पर होगा। अदालत ने यह आदेश पायलटों की 40 से अधिक याचिकाओं को स्वीकार करते हुए दिया है। एयर इंडिया ने इन सभी की सेवाएं 13 अगस्त, 2020 को समाप्त कर दी थीं। अदालत ने एयर इंडिया के महामारी में वित्तिय खराब हालत के तर्क को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि एयर इंडिया (एआई) के सभी पायलटों की सहायता के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कैरियर के फैसले को रद्द कर दिया और उनकी बहाली का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि विस्तृत निर्णय दो जून को मिलेगा। इन पायलटों ने एयर इंडिया के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एयर इंडिया ने तर्क रखा था कि याचिकाकर्ता ने स्वयं त्यागपत्र दिए थे और उसने त्यागपत्र देने वाले 40 से अधिक पायलटों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं।
पायलटों ने अपनी दलीलों में कहा कि उन्होंने शुरू में वेतन और भत्तों के भुगतान में देरी को लेकर अपने इस्तीफे दिए थे, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया था। एयर इंडिया ने अपने जवाब में कहा है कि वह पहले से ही करीब 30,000 करोड़ रुपये के कर्ज से जूझ रही है और इसके अलावा उसके पास विभिन्न बैंकों, पट्टेदारों, विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं की करीब 11,000 करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां हैं।
एयर इंडिया ने कहा पायलटों के वेतन और भत्तों के भुगतान में देरी किसी दुर्भावना के इरादे से नहीं की गई थी, बल्कि एयरलाइन की अनिश्चित वित्तीय स्थिति के कारण ऐसा हुआ। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के कारण उसका व्यवसायिक कामकाज काफी कम हो गया था और लगभग इसका पूरा बेड़ा जमीन पर था और इनके विकल्प में कार्यरत पायलट पहले से ही काम पर थे ऐसे में यदि इस्तीफा देने वालों को भी बोर्ड में रखा गया तो उनके पास पायलटों की अधिकता होगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा असाधारण परिस्थितियों के तहत त्यागपत्र वापस लेने की स्वीकृति जनहित के खिलाफ होगी।