नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने कथित एनकाउंटर में मारे गए दो लोगों के पीड़ित परिवारों को मुआवजा प्रदान न करने के मामले में मणिपुर सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि एनएचआरसी मानवाधिकारों की बेहतर सुरक्षा के लिए स्थापित एक सांविधिक निकाय के रूप में अपने बुनियादी कार्य का निर्वहन करने में विफल रहा है।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने यह निर्देश मानवाधिकार कार्यकर्ता सुहास चकमा की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याची ने मुआवजा संबंधी एनएचआरसी के 8 सितंबर 20120 के उस फैसले को भी चुनौती दी है जिसमें कहा था कि यदि सरकार उनके 5 मार्च के पांच लाख रुपये मुआवजे संबंधी आदेश का पान नहीं करती को पीड़ित अदालत में जा सकते हैं।
अदालत ने इस मुद्दे पर एनएचआरसी को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं अदालत ने मणिपुर सरकार को भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि पीड़ित परिवार को पांच लाख रुपये मुआवजा प्रदान करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
याची की ओर से पेश अधिवक्ता नितेश कुमार ने एनएचआरसी के पास स्वयं द्वारा दिए आदेश का पालन करवाने के लिए शक्तियां हैं और वह इस प्रकार याची को अदालत में याचिका दायर करने के लिए नहीं कह सकता। उन्होंनेेे कहा कि एनएचआरसी द्वारा मामले को 8 सितंबर के बाद सुनवाई के लिए बंद कर दिया जो अव्यवहारिक व अन्यायपूर्ण है।
एनएचआरसी का आदेश जनवरी 2009 में चकमा द्वारा दायर शिकायत पर आया था जिसमें मणिपुर पुलिस कमांडो और 16वें असम राइफल्स के संयुक्त बल द्वारा 21 जनवरी, 2009 को इंफाल के कांगलातोम्बी माखन रोड पर एक संयुक्त अभियान में दो लोगों-निंगथोजम आनंद सिंह और पालुंगबाम कुंज बिहारी उर्फ बोस का फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप लगाया था।
याचिका में कहा गया है कि फरवरी 2019 में मजिस्ट्रेट जांच रिपोर्ट पर विचार करने के बाद एनएचआरसी ने यह माना कि दोनों मृतकों को मणिपुर पुलिस कमांडो और 16वीं असम राइफल्स के संयुक्त बल ने फर्जी तरीके से मार गिराया था और उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन किया गया। एनएचआरसी ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया था कि एनकाउंटर सही था और सरकार को पांच लाख रुपये मुआवजा प्रदान करने का निर्देश दिया था।