हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप में समझौते को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वे पति-पत्नी के रूप में रहने लगे है। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए दुष्कर्म के मामले में समझौते के तर्क को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि ऐसा करने से समाज पर गलत संदेश जाएगा। सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने पीड़िता से शिवा बन कर दोस्ती की और विवाह का झांसा देकर पांच वर्ष तक उससे शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद उसने आर्य समाज मंदिर के नाम से फर्जी तरीके से विवाह प्रमाणपत्र बनाया व उसमें अपना नाम अख्तर लिखवाया।
अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि उसके पास शिवा और अख्तर के नाम से दो आधार कार्ड है जिनमें से एक फर्जी है। इसके अलावा पीड़िता ने अदालत के समक्ष धारा 164 के बयानों में अपनी शिकायत का समर्थन किया है।
अदालत ने कहा कि यह दिवानी मामला या पति-पत्नी के बीच विवाद का मामला नहीं है। बलात्कार और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों का असर समाज पर पड़ता है। इन अपराधों को केवल निजी या दीवानी विवाद नहीं माना जा सकता बल्कि इसका प्रभाव समाज पर पड़ेगा।