नई दिल्ली। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जेआर मिढ्ढा ने घोषणा के बाद भी नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी को लागू नहीं करने एवं अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने अदालत के समक्ष बहानेबाजी करने के मुद्दे को जनहित का मुद्दा मानते हुए इसे सुनवाई के लिए दो सदस्यीय पीठ के पास स्थानांतरित कर दिया। इसके साथ ही सुनवाई 15 जुलाई के लिए स्थगित कर दी है।
अदालत ने कहा कि सरकार के खिलाफ लगभग 4.80 लाख मुकदमे लंबित हैं, जिसमें से लगभग 1.18 मुकदमे वित्त मंत्रालय के खिलाफ ही हैं। उसके बाद रेलवे के खिलाफ लगभग एक लाख मुकदमे हैं। इस सबको देखते हुए ही सरकार ने 2010 में नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी बनाई थी। इसके बाद उसमें संशोधन 2015 से किया जा रहा था।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के वकील ने जानकारी दी है कि 2010 की लिटिगेशन पॉलिसी को लागू नहीं किया गया है। सरकार के पास लंबित मुकदमों की संख्या कम करने को लेकर फिलहाल कोई नीति नहीं है। अदालत ने इसके बाद इस मामले को जनहित का मानते हुए उसे दो सदस्यीय पीठ के पास स्थानांतरित कर दिया।
उन्होंने कहा कि कोई नीति नहीं होने की वजह से ही अधिकारी अदालत के समक्ष बहानेबाजी करते हैं। इसकी वजह है कि अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं है और वे झूठे दावे करते रहते हैं। अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और झूठ बोलने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा इसके लिए एक नीति होनी चाहिए।
उन्होंने सरकार से ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। ऐसे अधिकारियों के एसीआर में अदालत की टिप्पणी को भी जोड़ देने को कहा है। उन्होंने कहा कि इस वजह से ही बहुत सारे मुकदमे लंबित हैं। जब अदालत एक मामले में फैसला दे देती है तो अधिकारियों को चाहिए कि उसी आधार पर उस तरह के मामले का निपटारा कर दें, मगर वह झूठ बोलकर मामले को लटकाए रहते हैं।
अदालत ने यह टिप्पणियां रेलवे से संबंधित एक मामले में कीं। तीन लोगों की रेलवे स्टेशन के बाहर मौत हो गई थी और उन्हें रेलवे ट्रिब्युनल ने मुआवजा प्रदान किया लेकिन मुआवजा नहीं मिला। मामला हाईकोर्ट पहुंचा पर अधिकारी गलत जानकारी देते रहे। अदालत ने कहा अधिकारियों के रवैये का असर अदालत, सरकार पर पड़ता है लेकिन ऐसे अधिकारियों पर नहीं। ऐसे में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।