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एम्स को नर्सों के खिलाफ ठोस कार्रवाई न करने का निर्देश

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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को निर्देश दिया कि पिछले साल दिसंबर में एम्स नर्सेज यूनियन द्वारा बुलाई गई अनिश्चितकालीन हड़ताल के सिलसिले में नर्सों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न करे।
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न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने यह निर्देश नर्सेज यूनियन के वकील द्वारा अदालत को आश्वासन दिए जाने के बाद दिया कि भविष्य में औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना नर्सों द्वारा हड़ताल या हड़ताल की धमकी नहीं दी जाएगी ।
अदालत ने कहा कि नर्सों ने विशेष रूप से महामारी के समय एक आवश्यक सेवा का प्रदर्शन किया है। अदालत ने आदेश दिया कि दोनों पक्षों के बीच चल रही समझौता कार्यवाही को तीन महीने में तेजी से समाप्त किया जाना चाहिए। एम्स ने छठे केंद्रीय वेतन आयोग के तहत भुगतान निर्धारण की कवायद और महिला नर्सों के लिए 80 प्रतिशत आरक्षण सहित कई मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाने के बाद पिछले साल हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की थी।
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अदालत ने याचिका पर नर्सों की अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी रखने से रोकने के लिए अंतरिम आदेश पारित किया था। एम्स का कहना था कि हड़ताल गैरकानूनी है और औद्योगिक विवाद अधिनियम का उल्लंघन है क्योंकि धारा 22 के संदर्भ में छह सप्ताह का नोटिस नहीं दिया गया था।
नर्सेज यूनियन की ओर से पेश अधिवक्ता संतोश कृष्णन ने अदालत को बताया कि शिकायतों की जांच के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम के अनुसार पहले ही सुलह अधिकारी नियुक्त किया जा चुका है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि एम्स प्रशासन नर्सों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है ऐसे में कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
एम्स के वकील वी शशांक ने तर्क पेश किया कि अगर सुलह की कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया गया तो उनकी तरफ से कोई आपत्ति नहीं है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हड़ताल औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत अधिकार का मामला है और तय प्रक्रिया का पालन करने के बाद नर्सेज यूनियन द्वारा इसका लाभ उठाया जा सकता है। इसी के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।
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