पिता ने गुजारा-भत्ते में रकम इस्तेमाल करने की बात कही
पिता की ओर से दलील दी गई कि माता-पिता के बीच विवाद के कारण वे अलग रह रहे थे और फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत पत्नी के भरण-पोषण के लिए रकम खर्च की गई थी।
उन्होंने यह भी दावा किया कि वह पत्नी को अतिरिक्त गुजारा-भत्ता भी दे रहे थे, जिसका लाभ बेटी को भी मिल रहा था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का गुजारा-भत्ता और बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी अलग-अलग कानूनी जिम्मेदारियां हैं। पिता अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए बेटी के नाम पर जमा रकम का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
बेटी के नाम निवेश, तो रकम पर उसी का अधिकार
कोर्ट ने कहा कि पीपीएफ खाता पिता ने जरूर खोला था, लेकिन यह बेटी के लाभ और उसके भविष्य के लिए था। पिता इस खाते को केवल अभिभावक के तौर पर संचालित कर रहे थे। बेटी के बालिग होने के बाद वह इस रकम की हकदार थी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों की परवरिश और उनकी जरूरतों का खर्च माता-पिता की स्वतंत्र कानूनी जिम्मेदारी है। इसे बच्चे के नाम पर जमा निवेश से पूरा नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता को बेटी की पूरी पीपीएफ रकम 8 प्रतिशत ब्याज समेत वापस करने का निर्देश दिया।