हाईकोर्ट ने कहा आरोपियों व पीड़िता के बीच शारीरिक संबंध की पुष्टि न होने के कारण सामुहिक दुष्कर्म का मामला साबित नहीं हुआ। अदालत ने निचली अदालत के आदेश को संशोधित किया और बलात्कार के आरोपों के आरोपी को बरी करते हुए, सोडोमी के लिए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।
उच्च न्यायालय ने सोमवार को नाबालिग बेटी के साथ अप्राकृतिक कृत्य करने के दोषी पिता व उसके चाचा को मिली आजीवन कारावास की सजा को बहाल रखा है। वहीं अदालत ने शारीरिक संबंध न बनने के आधार पर उन्हें सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में मिली सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा भले ही किसी बच्चे के खिलाफ यौन हिंसा किसी भी तरह से घृणित है, लेकिन जब यह पिता-बेटी के रिश्ते में होता है तो यह भ्रष्टता में उतरता है और इसमें पाप के तत्व होते हैं।
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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा और 10,000 रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा है। अदालत ने यह आदेश दोषी पिता व चाचा की निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील का निपटारा करते हुए दिया है।
पीठ ने कहा हम दोहराने से नहीं हिचकिचाते एक मासूम बच्चे का यौन शोषण करना किसी भी मामले में एक घिनौना कृत्य है, लेकिन, जब पिता-पुत्री के रिश्ते में ऐसा होता है, जिसमें स्नेह की पवित्रता एक अनिवार्य शर्त है, तो यह कार्य भ्रष्टता की एक अलग गहराई तक उतरता है। बिना बाइबिल के प्रतीत हुए समाज में अपराध एक बात है, लेकिन अपराध परिवार की सबसे नजदीकी सीमा के भीतर इसे पाप के तत्व में जोड़ता है। इस तरह के कृत्यों से अपेक्षित स्तर की गंभीरता के साथ निपटा जाना चाहिए।
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आरोप है कि पीड़िता अपनी मौसी के साथ रहती थी, 2012 में गर्मी की छुट्टियों के दौरान उनके पिता उन्हें घर ले आए। इसके बाद दोनों आरोपियों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म और कुर्कम किया। पीड़िता ने अपने शिक्षक को घटना के बारे में बताया, जिसके बाद दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया और फिर निचली अदालत ने सामूहिक बलात्कार और सोडोमी के लिए दोषी ठहराया।
हाईकोर्ट ने कहा आरोपियों व पीड़िता के बीच शारीरिक संबंध की पुष्टि न होने के कारण सामुहिक दुष्कर्म का मामला साबित नहीं हुआ। अदालत ने निचली अदालत के आदेश को संशोधित किया और बलात्कार के आरोपों के आरोपी को बरी करते हुए, सोडोमी के लिए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।