सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते यौन अपराधों के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर दिल्ली पुलिस और संबंधित अधिकारियों से कहा कि पुलिस को पता होना चाहिए कि किन इलाकों में अपराध की दर अधिक है। इसके लिए नियमित सर्वेक्षण किए जाएं। स्थानीय लोगों से बातचीत की जाए। इससे उन लोगों के बारे में भी जानकारी मिल सकती है जो अपराध करने के बाद इन इलाकों में आकर रह रहे हैं।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला व न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ पार्क में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म व चलती स्लीपर बस में नाबालिग के कथित यौन उत्पीड़न मामले को स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू को न्यायमित्र नियुक्त किया था और कई निर्देश जारी किए थे। सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि अब समय आ गया है कि संबंधित अधिकारी, दिल्ली पुलिस, चुनौती के अनुरूप काम करें ताकि लोगों का पुलिस पर भरोसा दोबारा कायम हो सके।
योजनाएं कागज पर नहीं, जमीन पर दिखें
पीठ ने पुलिस अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों से जमीनी स्तर पर काम करने को कहा। कहा कि केवल योजनाएं कागज पर तैयार कर देने से दुष्कर्म जैसे अपराधों को रोकना संभव नहीं होगा।
कोर्ट, सरकार, पुलिस को मिलकर करना होगा प्रयास
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका, सरकार, पुलिस विभाग और न्यायमित्र को विभिन्न पहलुओं पर मिलकर विचार करना चाहिए और ऐसी घटनाओं को बार-बार होने से रोकने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। अदालत ने कहा कि व्यवस्था में यदि कोई कमी है तो वह अपराध करने में सहायक नहीं बननी चाहिए।
पीठ ने पुलिस रवैये पर उठाया सवाल
पीठ ने कहा, जब एक पार्क में नाबालिग के साथ कथित अपराध हुआ, तब स्थानीय लोगों ने पुलिस को असामाजिक तत्वों द्वारा पैदा की जा रही परेशानी की जानकारी दी थी। इसके बावजूद पुलिस ने उनकी शिकायत को गंभीरता से क्यों नहीं लिया।
संवेदनशील स्थानों की पहचान पर जोर
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को सीसीटीवी कैमरों, रोशनी और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाओं से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने की बात कही। इस पर जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि पार्कों, रेलवे स्टेशनों, सबवे और ऐसे अन्य संवेदनशील स्थानों की पहचान की जानी चाहिए, जहां पर्याप्त सुरक्षा और रोशनी नहीं है। उन्होंने इन क्षेत्रों में तत्काल काम करने की जरूरत बताई।